Wednesday, July 1, 2026
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Salary Claim: ‘2.5 लाख है अब 1 लाख के बराबर’, सोशल मीडिया पर इस आंत्रप्रिन्योर की सैलरी पर पोस्ट ने छेड़ी बहस


Salary Claim: ये दौर महंगाई का दौर है, इस बात से किसी भी तरह से कोई मुकर नहीं सकता. महंगाई इस समय में दिन दोगुनी और रात चौगुनी की रफ्तार से बढ़ रही है. तेल- गैस के दामों में इजाफा, किराया- भाड़ा में बढ़ोतरी, ब्याजदरों में बढ़ोतरी, हर तरह से जनता के ऊपर महंगाई की मार पड़ रही है. इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि लोगों की सैलरी भी अब ना के बराबर लगती है. ऐसा हम नहीं बल्कि बेंगलुरु के एक आंतत्रप्रिन्योर का कहना है.

दरअसल सोशल मीडिया पर एक पोस्ट तेजी से वायरल हो रही है. जिसमें नए दौर की नई सैलरी के बारे में बात की जा रही है. इस पोस्ट में बताया गया है कि आजकल मेट्रो सिटी में जो सैलरी लोगों को मिल रही है, वो असल खर्च से काफी कम है. ये पोस्ट बेंगलुरु के रहने वाले एक आंत्रप्रिन्योर की है, जिनके इस इस पोस्ट ने सोशल मीडिया पर तगड़ी बहस छेड़ दी है.

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क्या है पोस्ट?
बेंगुलुरु के रहने वाले एक आंत्रप्रिन्योर निकेत राज द्विवेदी ने कुछ दिन पहले एक ट्वीट किया. इस ट्वीट में उन्होंने लिखा, ‘2.5 लाख हर महीने नया 1 लाख रुपये है’. जिसका सीधे तौर पर मतलब है कि यदि आपकी सैलरी ढाई लाख रुपये है तो ये आज के दौर के हिसाब से 1 लाख रुपये के बराबर है. इतना ही नहीं उन्होंने इसके लिए दो शहरों का नाम भी लिखा, ‘खासतौर से मुंबई और बेंगलुरु’ जैसे शहरों के लिए. यहां देखें पोस्ट:

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
निकेत के इस ट्वीट को लेकर सोशल मीडिया पर काफी तगड़ी बहस छिड़ गई है. कई यूजर्स उनके इस ट्वीट से सहमत हैं, तो कई लोग इसके खिलाफ भी नजर आ रहे हैं. एक यूजर ने इस पर कमेंट करते हुए लिखा, ‘कई लोग असलियत से कितना दूर है, ये बात वाकई इम्प्रेसिव है.’ तो वहीं एक अन्य यूजर ने लिखा, ‘वाकई, अब 28 लाख LPA को नॉर्मल समझना चाहिए.’ तो वहीं एक अन्य यूजर ने लिखा, ‘1 लाख हर महीने सैलरी को 20 हजार समझना चाहिए.’

 

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इस पोस्ट पर इसी तरह के कमेंट्स लोगों के आ रहे हैं. ये बात तो साफ है कि महंगाई का दौर है, रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाले सामान तक काफी महंगे हो रहे हैं. ऐसे में निकेत की बात को पूरी तरह से सिरे से खारिज भी नहीं किया जा सकता. हालांकि निकेत केवल मेट्रो सिटीज की बात कर रहे हैं. छोटे शहरों में कई लोगों की सैलरी 40-50 हजार या उससे कम भी होती है, जिसमें उन्हें हर हाल में गुजारा करना पड़ता है.



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