Tuesday, September 15, 2026
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Explained: अमेरिका-ईरान शांति समझौते के कुछ दिन बाद या कई महीने! होर्मुज स्ट्रेट से सप्लाई चेन कब नॉर्मल होगी?


‘दुनिया के जहाजों, अपने इंजन चालू कर लो. तेल को बहने दो…’ 14 जून 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर यह पोस्ट लिखकर दुनिया को खबर दी. ईरान के साथ युद्ध विराम का समझौता हो गया है. इसके साथ ही 107 दिन से चल रहा अमेरिका-ईरान युद्ध रुक जाएगा और दुनिया की 20 फीसदी तेल सप्लाई का रास्ता फिर खुल जाएगा. 19 जून (शुक्रवार) को स्विट्जरलैंड के जिनेवा में दोनों देश औपचारिक रूप से इस समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर करेंगे. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इसका ऐलान किया, जिनकी सरकार ने पिछले कई हफ्तों से बैकचैनल टॉक में मध्यस्थता की थी. क्या शुक्रवार दोपहर 12 बजते ही तेल के टैंकर स्ट्रेट में दौड़ने लगेंगे या ग्लोबल सप्लाई चेन नॉर्मल होने में महीनों लगेंगे? एक्सप्लेनर में समझते हैं…

सबसे पहले जान लेते हैं कि सप्लाई चेन नॉर्मल होने में कितना वक्त लगेगा?

ट्रंप ने एलान कर दिया है कि होर्मुज स्ट्रेट खुलेगा. लेकिन विदेश मामलों के जानकार और BHU के प्रोफेसर प्रियंकर उपाध्याय कहते हैं, ‘ऐसा नहीं है कि शुक्रवार दोपहर 12 बजते ही हजारों टैंकर फिर से दौड़ने लगेंगे. असली सप्लाई चेन सामान्य होने में एक हफ्ते से लेकर कई महीनों तक का समय लग सकता है.’ इस डीऑर्बिट टाइमलाइन को समझते हैं:

  • हस्ताक्षर से पहले (14-19 जून): ईरान अभी भी अपनी शर्तों पर अड़ा है. ईरान के उप विदेश मंत्री काजिम गरीबाबादी ने कहा, ‘हमने मसौदे में अपनी सभी बड़ी मांगें शामिल कर ली हैं. यह दस्तावेज वॉशिंगटन पर भरोसा करने का संकेत नहीं है. 60 दिनों की बातचीत तभी शुरू होगी जब हमें भरोसा हो जाएगा कि अमेरिका ने अपने वादे पूरे कर दिए हैं.’ अमेरिकी प्रशासन ने संकेत दिया है कि खदानें हटाने के लिए शुक्रवार तक तैयारी हो जाएगी.
  • डील के शुरुआती 7 दिन (19-26 जून): 19 जून को जैसे ही दोनों पक्ष साइन करेंगे, अमेरिकी नौसेना अपनी नाकेबंदी तुरंत हटा देगी. साथ ही, ईरान को तेल प्रतिबंधों से तत्काल छूट मिल जाएगी. हालांकि,VLCC टैंकर कुछ ही घंटों में फारस की खाड़ी के अंदरूनी हिस्से से बाहर निकलना शुरू हो जाएंगे. सबसे पहले वे टैंकर बाहर निकलेंगे जो पहले से ही लोडेड हैं और गल्फ में ही रणनीतिक तौर पर रोके गए थे. एक्सपर्ट्स का मानना है कि सभी तकनीकी और प्रशासनिक खत्म कर दी जाएं, तो पहला टैंकर 2-3 दिनों में स्ट्रेट से बाहर निकल सकता है, लेकिन बड़े पैमाने पर ट्रैफिक में एक हफ्ता लग सकता है.
  • डील के 7 से 30 दिन (26 जून-19 जुलाई): सबसे बड़ी अड़चन माइन्स हैं. अमेरिकी अधिकारियों का आरोप है कि ईरान ने संघर्ष के दौरान स्ट्रेट में कई जगहों पर माइन्स बिछा दी थीं. एक बार जब नेवी का रास्ता साफ हो जाएगा, तभी निजी टैंकर वहां से गुजर सकेंगे. ट्रंप ने लिखा, ‘स्ट्रेट शुक्रवार को डील पर साइन के साथ, माइन्स हटाने के उद्देश्य से खुलेगा.’ इसलिए, यह कोई सामान्य री-ओपनिंग नहीं है. ईरान के साथ समझौता होने से कंपनियों का भरोसा लौटेगा. पिछले तीन महीने से जो शिपिंग इंश्योरेंस प्रीमियम आसमान छू रहा था, वह धीरे-धीरे नॉर्मल हो जाएगा.
  • 30 से 60 दिन (19 जुलाई-अगस्त): अमेरिका को अपने सभी वादे पूरे करने होंगे. हालांकि शुरुआत में तेल की कीमतों में तेजी से गिरावट आ सकती है, लेकिन अगर माइन्स की सफाई में देरी होती है या न्यूक्लियर पर बातचीत में फंसाव आता है, तो कीमतें फिर से उछल सकती हैं. एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर दोबारा हमले या तनाव नहीं बढ़ा, तो शिपिंग वॉल्यूम तीन से चार महीने (सितंबर-अक्टूबर 2026) में पूर्व-युद्ध स्तर 140 प्रतिदिन पर पहुंच सकता है.

एक चेतावनी बनी हुई है कि इजरायल की ओर से लेबनान में नए सैन्य अभियान की स्थिति में, ईरान होर्मुज को फिर से बंद करने या टैंकरों को निशाना बनाने का फैसला ले सकता है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था फिर खतरे में पड़ सकती है.

भारत के लिए कितनी बड़ी राहत है यह डील?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल इम्पोर्टर देश है. युद्ध शुरू होने से पहले भारत अपनी जरूरत का 88% से ज्यादा कच्चा तेल इम्पोर्ट करता था. इसका आधा हिस्सा खाड़ी देशों से आता था, जो होर्मुज से गुजरता है. भारत घरेलू खपत की 60% LPG गैस भी आयात करता है, जिसमें 90% हिस्सा होर्मुज से होकर आता है. LNG गैस की आधी मांग भी आयात पर निर्भर करती है, जिसमें से 65% कतर और  UAE से आती थी. युद्ध की वजह से इन सभी पर गहरा संकट आ गया था.

लेकिन इस डील के बाद, भारत सरकार के लिए तत्काल तीन बड़ी राहतें आ गई हैं:

  • पेट्रोल-डीजल की कीमतों में जल्द गिरावट: युद्ध के चरम पर ब्रेंट क्रूड की कीमत 119 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई थी, जो फरवरी में 70-72 डॉलर थी. जैसे ही ट्रंप ने डील का ऐलान किया, ब्रेंट क्रूड 4% गिरकर लगभग 84 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया. भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें मई में बढ़ाई गई थीं. पेट्रोल-डीजल पर करीब 7.50 रुपए प्रति लीटर, CNG पर 6 रुपए प्रति किलोग्राम और LPG सिलेंडर पर 89 रुपए बढ़े. एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि अगर तेल की कीमतें 84 डॉलर पर स्थिर रहीं या उससे नीचे गईं, तो सरकार जल्द ही पेट्रोल-डीजल के दामों में 2 रुपए से 5 रुपए प्रति लीटर तक की कटौती कर सकती है. वहीं, सिलेंडर के दाम 30 से 50 रुपए तक घट सकते हैं.
  • रुपये पर दबाव कम: ग्लोबल एनालिटिक कंपनी CRISIL के अनुमान के मुताबिक, तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी, भारत के तेल आयात बिल को 13-14 बिलियन डॉलर बढ़ा देती है. तेल की कीमतों में गिरावट से भारत को डॉलर की कम जरूरत पड़ेगी, जिससे रुपया मजबूत होगा.
  • महंगाई में कमी: केयरएज के अर्थशास्त्री रेवती कस्तूरे के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत की हेडलाइन महंगाई में 55-60 बेसिस पॉइंट (0.55-0.60%) का इजाफा हो जाता है. अगर तेल की कीमत गिरती है तो इसी अनुपात में महंगाई घटने लगेगी. यह उन करोड़ों परिवारों के लिए बड़ी राहत है जो फिलहाल 650 करोड़ प्रतिदिन के सब्सिडी के बोझ से जूझ रहे हैं.

क्या भारत को ईरानी तेल वापस मिल सकेगा?

भारत ने पिछले कुछ महीनों में अपनी तेल इम्पोर्ट की लिस्ट में काफी बदलाव किया है. पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक, अप्रैल-मई 2026 में रूस, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका जैसे गैर-होर्मुज स्रोतों से कच्चे तेल की खरीद 55% से बढ़कर 70% हो गई थी. जबकि आयात में गिरावट की स्थिति बनी हुई थी. लेकिन इस समझौते के बाद, ईरानी कच्चे तेल की वापसी की संभावना खुल गई है.

ड्राफ्ट MoU के मुताबिक, अमेरिका ‘एक खास अवधि के लिए ईरानी तेल प्रतिबंधों में छूट देगा.’ इसका मतलब है कि भारत ईरान से सीधा तेल आयात कर सकेगा, जो पारंपरिक रूप से भारत के लिए फायदेमंद रहा है. हालांकि, अभी यह साफ नहीं है कि यह छूट कितने दिनों के लिए होगी और इसकी शर्तें क्या होंगी.

क्या फिर से बिगड़ सकता है माहौल?

यह भी सच है कि यह समझौता नाजुक है. प्रियंकर उपाध्याय के मुताबिक, इस डील में अभी भी कई सवाल बाकी हैं:

  • सबसे बड़ा खतरा इजरायल है. ट्रंप ने साफ कहा कि वह नेतन्याहू से नाराज हैं और उनका कहना है कि ‘इजरायल को लेबनान में और हमले नहीं करने चाहिए, खासकर उस दिन जब हम शांति समझौते के बेहद करीब थे.’ हालांकि, डील टिक गई, लेकिन अगर इजरायल फिर से कोई सैन्य कार्रवाई शुरू करता है, तो ईरान या हिजबुल्लाह तुरंत जवाब दे सकते हैं.
  • ईरानी सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने भी साफ कर दिया है कि ‘जब तक अमेरिकाअपने वादे पूरे करने का भरोसा नहीं देता, तब तक आखिरी बातचीत टलती रहेगी.’ इसका मतलब है कि जब तक पैसा भारत के खाते में नहीं आता, तब तक कोई भरोसा नहीं है.
  • इसके अलावा, ट्रंप खुद दावा करते हैं कि ‘ईरान कभी परमाणु हथियार हासिल नहीं करेगा.’ लेकिन इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) के मुताबिक, ईरान के पास 440.9 किलोग्राम यूरेनियम है जो 60% शुद्धता तक एनरिच्ड है. यह हथियार-ग्रेड (90%) स्तर से केवल एक तकनीकी कदम दूर है. अगर 60 दिनों के भीतर इस पर कोई समाधान नहीं निकलता है, तो यह डील फिर से बिखर सकती है.

इंजन तो चालू हो गए, लेकिन रफ्तार धीरे-धीरे आएगी

डोनाल्ड ट्रंप के ‘शिप्स ऑफ द वर्ल्ड, स्टार्ट योर इंजन’ ने एक नई उम्मीद जगा दी है. पेट्रोल पंपों पर लाइनें लगे लोगों से लेकर तेल कारोबारियों तक, हर कोई राहत की सांस ले रहा है. हालांकि, स्ट्रेट खुलने का मतलब सिर्फ टैंकरों का चलना नहीं है, बल्कि इसमें खदानों की सफाई, बीमा दरों का सामान्य होना और ईरानी तेल की वापसी शामिल है. दुनिया की सप्लाई चेन को सामान्य होने में अभी थोड़ा और वक्त लगेगा, लेकिन कम से कम यह शुरुआत तो हो गई है.

चाहे वह आम आदमी हो, जो सोच रहा है कि इस महीने गैस सिलेंडर का बिल कम आएगा या नहीं, या वह मालाबार तट पर खड़ा भारतीय शिपिंग कर्मी जो फिर से कमाई के लिए खाड़ी की ओर रवाना हो सकेगा. यह सौदा सबके लिए वरदान साबित हो सकता है.



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