West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल की राजनीति इस वक्त बड़े उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है, जहां चुनावी झटके के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर बगावत की लहर तेज होती नजर आ रही है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी में हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि लोकसभा से लेकर राज्यसभा तक इस्तीफों और अलग गुट बनाने की खबरें सामने आ रही हैं.
टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से करीब 20 सांसदों के बागी गुट में शामिल होने और एनडीए को समर्थन देने के दावे ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है. इस बागी गुट की अगुवाई काकोली घोष दस्तीदार कर रही हैं, जो कभी पार्टी की सबसे मजबूत संसदीय स्तंभ मानी जाती थीं. उनके साथ शताब्दी रॉय, मिताली बाग, सायोनी घोष समेत कई बड़े नामों के जुड़ने की चर्चा ने इस संकट को और गहरा कर दिया है.
करीबियों ने छोड़ा साथ
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चौंकाने वाला नाम सायोनी घोष का है, जिन्हें ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की करीबी और टीएमसी की उभरती हुई युवा नेता माना जाता रहा है. सायोनी, जो अपनी आक्रामक शैली और पार्टी के पक्ष में मुखर आवाज के लिए जानी जाती थीं, अचानक सुर्खियों में तब आ गईं जब उनकी केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से मुलाकात की खबर सामने आई.
इस दौरान पश्चिम बंगाल के नेता शुभेंदु अधिकारी की मौजूदगी ने राजनीतिक अटकलों को और हवा दे दी. खास बात यह रही कि सायोनी का बदला हुआ हुलिया जींस, टोपी, मास्क और चश्मे में नजर आना भी चर्चा का विषय बना, जिससे यह सवाल उठने लगे कि क्या वह मीडिया से बचने की कोशिश कर रही थीं. हालांकि, अब तक उन्होंने इन खबरों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है.
दूसरी ओर, टीएमसी के भीतर असंतोष का दायरा सिर्फ लोकसभा तक सीमित नहीं है. राज्यसभा में भी सुष्मिता देव, सुखेंदु शेखर रॉय और प्रकाश चिक बड़ाइक जैसे नेताओं के इस्तीफे ने पार्टी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. सुष्मिता देव के इस्तीफे के बाद असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा से उनकी मुलाकात ने उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर नए संकेत दिए हैं. वहीं, बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर अलग गुट के रूप में मान्यता की मांग भी की है, जिससे यह साफ हो गया है कि यह असंतोष अब खुली बगावत में बदल चुका है.
बगावत से रणनीति पर सवाल
टीएमसी नेतृत्व इस पूरे घटनाक्रम को गंभीर चुनौती के तौर पर देख रहा है. चुनाव के बाद संगठन में फेरबदल के जरिए ममता बनर्जी ने पार्टी को मजबूत करने की कोशिश की थी, लेकिन बगावत ने उस रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं. पार्टी के भीतर यह भी चर्चा है कि नेतृत्व को लेकर असंतोष और अंदरूनी खींचतान ने इस संकट को जन्म दिया है.
पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह घटनाक्रम सिर्फ एक पार्टी के भीतर का विवाद नहीं, बल्कि आने वाले समय में राज्य की सत्ता संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है. टीएमसी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपनी एकजुटता बनाए रखने और बागी नेताओं के असर को सीमित करने की है, जबकि विपक्ष इस मौके को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश में जुटा हुआ है.
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