Tuesday, April 21, 2026
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बैंकॉक चेस ओपन; अरण्यक बने भारत के 95वें ग्रैंडमास्टर:आर्थिक तंगी दिमाग पर ऐसे हावी, हर मैच करियर बचाने की चुनौती मानकर खेलते थे




भारतीय शतरंज के लिए हालिया हफ्ता ऐतिहासिक उपलब्धियों वाला रहा। आर. वैशाली के महिला वर्ल्ड चैम्पियनशिप के लिए क्वालिफाई करने और एएस श्रा​वणिका के अंडर-12 रैपिड खिताब जीतने के बाद, अब कोलकाता के अरण्यक घोष ने भारत का 95वां ग्रैंडमास्टर बनकर देश का गौरव बढ़ाया है। नेशनल रैपिड चैम्पियन अरण्यक ने बैंकॉक चेस क्लब ओपन में 9 में से 7 अंक हासिल कर अपना तीसरा और अंतिम ग्रैंडमास्टर नॉर्म प्राप्त किया। अरण्यक को इस मुकाम तक पहुंचने के लिए कड़ा परिश्रम करना पड़ा। उन्होंने पहला नॉर्म 2023 (सैंट्स ओपन) और दूसरा 2024 (एनेमासे मास्टर्स) में हासिल किया था। उन्होंने पिछले साल फिडे वर्ल्ड कप में पोलैंड के माटुस्ज बार्टेल को हराकर सबको चौंकाया था। अरण्यक वर्ल्ड रैंकिंग में 401वें स्थान पर मौजूद हैं। तनावमुक्त रहने के लिए कार्टून वाली हुडी पहनकर खेलते हैं – अरण्यक जब साढ़े चार साल के थे, तब घर की सफाई में मां संचिता को पिता मृणाल घोष की पुरानी, धूल भरी शतरंज पेटी मिली। नन्हे अरण्यक गोटियां सजाकर खेलने लगे। बेटे की रुचि देख पिता मृणाल घोष ने उन्हें ट्रेनिंग दिलवाई। – कोच सौमेन मजूमदार ने अरण्यक की आर्थिक तंगी को देखते हुए उन्हें मुफ्त कोचिंग दी और अपने खर्च पर शीर्ष ग्रैंडमास्टर्स से ट्रेनिंग सत्र कराए। – अरण्यक के पास कॉर्पोरेट स्पॉन्सर नहीं था, इसलिए इनामी राशि से ही अगले टूर्नामेंट की फीस देते और टिकट वगैरह का खर्च उठाते। साल 2019 में पिता ने फीस के लिए पुश्तैनी जमीन और संपत्तियां बेच दीं। अरण्यक जानते थे कि खराब प्रदर्शन का मतलब अगला मौका खत्म, इसलिए हर मैच को करियर बचाने की चुनौती मानकर खेला। – मां संचिता घोष ने बेटे के करियर के लिए वकालत छोड़ दी, ताकि विदेशी टूर्नामेंट में साथ जा सकें। यूरोप दौरों में खर्च बचाने के लिए सस्ते कमरों में रहते और खुद खाना बनाते थे। – जहां खिलाड़ी औपचारिक कपड़ों में खेलते हैं, वहीं अरण्यक कार्टून थीम वाली हुडी पहनकर बोर्ड पर बैठते हैं। यह उन्हें बड़े टूर्नामेंट के दबाव में भी सहज और तनावमुक्त रखती है। – 2013 में अरण्यक ईरान में एशियन यूथ चेस चैम्पियन​शिप खेलने गए। तब मां संचिता ने उन्हें ईरानी केसर लाने को कहा था। 9 साल के अरण्यक ने मां की यह इच्छा भी पूरी की और अंडर-10 वर्ग में सिल्वर मेडल जीतकर लौटे। – वे बचपन से ही थैलेसीमिया से जूझ रहे हैं, जिसमें खून कम होने से लगातार थकान रहती है। इसके बावजूद वे कई बार बुखार और दर्द में भी टूर्नामेंट खेलने पहुंचे। घर पर रहने का विकल्प था, लेकिन उन्होंने शतरंज को ही अपना सहारा बनाया। उनका कहना है कि बिस्तर पर रहने से बेहतर उन्हें चालें सोचना लगता। यही जिद और मानसिक मजबूती उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।



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