एक तरफ रूस का दोस्ताना हाथ है जो सस्ते तेल का भरोसा दिला रहा है, तो दूसरी तरफ अमेरिका का चाबुक है जो टैरिफ और प्रतिबंधों की धमकी से हर आयात को महंगा बनाने पर तुला है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक को यह कहना पड़ा कि लोग पेट्रोल-डीजल कम इस्तेमाल करें, क्योंकि जिस इलाके से दुनिया को सबसे ज्यादा तेल मिलता है वो जंग की आग में जल रहा है. इसी बीच रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने दिल्ली में होने वाली ब्रिक्स बैठक से ठीक पहले बयान दिया, ‘भारत तेल की चिंता बिल्कुल न करे.’ सवाल ये है कि जब आंकड़े पूरी तरह उलटी तस्वीर दिखा रहे हैं, तो क्या वाकई ये भरोसा काफी है?
लावरोव के आश्वासन के पीछे का असली दांव
रूसी विदेश मंत्री ने RT इंडिया को दिए इंटरव्यू में खुलकर कहा कि भारत और रूस के रिश्ते आजादी से पहले के हैं और दुनिया की कोई भी ताकत इसे कमजोर नहीं कर सकती. जब उनसे पूछा गया कि अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते रूसी तेल कंपनियों लुकोइल और रोसनेफ्ट पर बैन के बाद भारत का आयात क्यों गिरा, तो उन्होंने सीधे अमेरिका को निशाने पर लिया.
लावरोव ने कहा, ‘यह अमेरिका का गैरकानूनी फैसला है. भारत का इससे कोई लेना-देना नहीं है. हम सुनिश्चित करेंगे कि यह खेल हमारे कॉन्ट्रैक्ट्स पर असर न डाले और भारत के हितों को कोई नुकसान न हो.’ उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अमेरिका का मकसद बस इतना है कि तुम सस्ता रूसी तेल न खरीदो, बल्कि मेरा महंगा तेल और LNG खरीदो ताकि मैं दुनिया की ऊर्जा पर राज कर सकूं.

जमीनी हकीकत के आंकड़े डरा क्यों रहे हैं?
बातों-बातों में भरोसा अच्छी चीज है, लेकिन असली कहानी तो आंकड़े सुनाते हैं. भारत अपनी कुल जरूरत का करीब 90 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है. यूक्रेन जंग के बाद रूस ने जो सस्ता तेल देना शुरू किया, उसने पूरा गणित ही बदल दिया. जुलाई 2024 में रूस भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन गया और कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी 44.6% के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई. लेकिन फिर अमेरिका ने कड़े प्रतिबंधों और टैरिफ की धमकियों की झड़ी लगा दी.
नतीजा यह हुआ कि महज डेढ़ साल के अंदर जनवरी 2026 तक यह हिस्सा गिरकर सीधे 20.6% पर आ गया. मान लीजिए, आपकी सस्ती रसोई गैस का सिलेंडर अचानक आधे से भी कम हो जाए, तो चिंता तो होगी ही. यही भारत के ऊर्जा सुरक्षा का हाल है.
एक्सपर्ट्स के बीच सीधी जंग: अमेरिका से डरें या रूस से साथी बढ़ाएं?
इस मसले पर दिल्ली के कूटनीतिक गलियारों में राय बंटी हुई है. पूर्व वाणिज्य अधिकारी और ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के प्रमुख अजय श्रीवास्तव साफ-साफ आक्रामक रुख अपनाने की सलाह देते हैं. उन्होंने बीबीसी से कहा है कि यह ‘आपातकाल जैसी स्थिति’ है. वह समझाते हैं, ‘खाड़ी देशों से आने वाला करीब 50 फीसदी तेल होर्मुज स्ट्रेट के चलते अटका है और बाकी 30 फीसदी जो हम रूस से ले रहे थे वो अमेरिकी दबाव में रुक गया है. हमें अमेरिका की जायज-नाजायज धमकियों को दरकिनार करते हुए अभी से 30-50 साल का समझैता कर लेना चाहिए.’ उनका तर्क है कि अमेरिका के पास इतना तेल है ही नहीं कि वह रूस की जगह ले सके, क्योंकि उसकी रिफाइनरियां आने वाले 10 साल तक ही बन पाएंगी.
लेकिन दूसरी तरफ, ORF अमेरिका के फेलो रिसर्चर विवेक मिश्र इस कड़वे सच की ओर इशारा करते हैं कि भारत फिलहाल अमेरिका से खुलकर भिड़ने की स्थिति में नहीं है. उन्होंने कहा, ‘रूस के साथ तेल खरीदने के लिए स्ट्रैटजिक प्लान की जरूरत है. अमेरिका ने रूसी तेल खरीद पर सैंक्शन लगाए हैं. अगर भारत ने तेल खरीदा तो भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है. PM मोदी ने तेल-गैस बचाने की अपील की है, जिसपर सख्ती से अमल करना चाहिए. न कि सैंक्शन्ड रूसी तेल खरीदने की तरफ.’

यही वजह है कि भारत सरकार ने एक बेहद चालाकी भरी ‘धुंधली’ नीति अपनाई हुई है. न तो यह कभी ऐलान किया गया कि रूस से तेल खरीद बंद कर दिया और न ही खरीदारी के आंकड़ों पर कभी खुलकर बात की गई. फरवरी-मार्च 2026 में रूसी तेल की खरीद में हल्का उछाल भी आया, लेकिन यह पूरी तरह पर्दे के पीछे चल रहा है.
भारत के पास आगे का रास्ता क्या होगा?
यह तनाव सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि ब्रिक्स जैसे मंचों पर भी फूट साफ नजर आती है. अमेरिका जहां भारत को अपनी तरफ खींच रहा है, वहीं रूस और चीन के साथ ईरान एक नया ध्रुवीकरण कर चुके हैं.
लावरोव भले ही तसल्ली दे रहे हों, लेकिन जब तक भारत के पास अमेरिकी टैरिफ और प्रतिबंधों से बचने का कोई स्थायी कूटनीतिक हल नहीं निकलता, तब तक सस्ता रूसी तेल एक ‘ऑप्शन’ तो बना रहेगा, लेकिन उसे बेधड़क इस्तेमाल करने की आजादी नहीं मिल पाएगी. यह एक ऐसी सुई की नोक पर चलने जैसा है, जहां एक तरफ ऊर्जा सुरक्षा है तो दूसरी तरफ अमेरिकी बाजार और निवेश.


