Thursday, August 13, 2026
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Bangladesh President Election | Mirza Fakhrul Islam Alamgir BNP Candidate


ढाका48 मिनट पहलेलेखक: मोहम्मद अरिफुल इस्लाम

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BNP के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर। (फाइल फोटो) - Dainik Bhaskar

BNP के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर। (फाइल फोटो)

बांग्लादेश की रूलिंग पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर अब देश के अगले राष्ट्रपति बनने की राह पर हैं। BNP ने गुरुवार को राष्ट्रपति चुनाव के लिए उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया है।

बांग्लादेश में राष्ट्रपति को जनता सीधे नहीं चुनती। संसद के सदस्य राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं। राष्ट्रपति चुनाव के लिए 20 अगस्त को मतदान होगा। फरवरी में हुए आम चुनाव में BNP को संसद में दो-तिहाई बहुमत मिला था। इसलिए फखरुल की जीत लगभग तय मानी जा रही है।

उन्होंने 1960 के दशक में ढाका यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र की पढ़ाई की थी और 1972 में वे ढाका कॉलेज में लेक्चरर बने। 2001 में खालिदा जिया के नेतृत्व वाली BNP सरकार में वे पहले कृषि राज्य मंत्री रहे। बाद में उन्होंने नागरिक उड्डयन और पर्यटन राज्य मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाली।

खालिदा जिया और मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर बातचीत करते हुए। (फाइल फोटो)

खालिदा जिया और मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर बातचीत करते हुए। (फाइल फोटो)

छात्र राजनीति से शुरू हुआ सफर

फखरुल का राजनीतिक सफर करीब छह दशक पुराना है। 1960 के दशक में ढाका यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान उन्होंने छात्र राजनीति शुरू की। वे उस समय ईस्ट पाकिस्तान स्टूडेंट्स यूनियन से जुड़े थे।

1969 में राष्ट्रपति अयूब खान के खिलाफ बड़े जन आंदोलन के दौरान वे छात्र संगठन की ढाका यूनिवर्सिटी इकाई के अध्यक्ष थे। राजनीतिक गतिविधियों के कारण उन्हें गिरफ्तार भी किया गया और जेल जाना पड़ा।

हालांकि, छात्र राजनीति के बाद वे तुरंत सक्रिय राजनीति में नहीं आए। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने शिक्षक के तौर पर करियर शुरू किया। 1972 में ढाका कॉलेज में लेक्चरर बने। बाद में कई सरकारी कॉलेजों में भी पढ़ाया।

1986 में सरकारी नौकरी छोड़ राजनीति में आए

  • 1986 में फखरुल ने सरकारी नौकरी छोड़ दी।
  • 1988 में वे निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर ठाकुरगांव नगरपालिका के चेयरमैन चुने गए।
  • 1990 के दशक की शुरुआत में वे BNP में शामिल हुए।
  • 1992 में BNP की ठाकुरगांव जिला इकाई के बने। यहीं से उनकी राष्ट्रीय राजनीति की शुरुआत हुई।
  • 2001 के आम चुनाव में फखरुल ठाकुरगांव-1 सीट से BNP के उम्मीदवार के तौर पर सांसद चुने गए। पहले कृषि राज्य मंत्री बने बाद में नागरिक उड्डयन और पर्यटन राज्य मंत्री बने।
  • 2011 में BNP के कार्यवाहक महासचिव बने।
  • 2016 आधिकारिक तौर पर BNP का महासचिव नियुक्त किया गया। 10 साल तक यह पद संभाला।

उम्मीदवारी मिलते ही फखरुल ने BNP के महासचिव पद और पार्टी की स्थायी समिति से इस्तीफा दे दिया। गुरुवार को ही उनका नामांकन पत्र चुनाव आयोग में जमा कर दिया गया।

विपक्षी पार्टी ने भी उम्मीदवार उतारा

बांग्लादेश की मुख्य विपक्षी पार्टी जमात-ए-इस्लामी ने भी अपना उम्मीदवार उतारा है। जमात के नेतृत्व वाले गठबंधन के नेता और लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष कर्नल (रिटायर्ड) ओली अहमद ने अपना नामांकन पत्र जमा कर दिया है।

कर्नल (रिटायर्ड) ओली अहमद बांग्लादेश के जाने-माने और अनुभवी राजनेता हैं। वह 1971 के बांग्लादेश लिबरेशन वॉर में भी शामिल रहे थे। वे पहले सेना में कर्नल के पद पर रहे और बाद में राजनीति में सक्रिय हुए। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की सरकार में मंत्री के तौर पर भी काम किया।

कर्नल (रिटायर्ड) ओली अहमद को ‘बीर बिक्रम’ का खिताब भी दिया गया है। यह बांग्लादेश के वीरता के प्रमुख सैन्य सम्मानों में से एक है। (फाइल फोटो)

कर्नल (रिटायर्ड) ओली अहमद को ‘बीर बिक्रम’ का खिताब भी दिया गया है। यह बांग्लादेश के वीरता के प्रमुख सैन्य सम्मानों में से एक है। (फाइल फोटो)

बांग्लादेश में 35 साल बाद हो रहे है राष्ट्रपति चुनाव

बांग्लादेश में करीब 35 साल बाद राष्ट्रपति चुनाव एकतरफा नहीं रहेगा। 1991 के बाद यह पहली बार है जब राष्ट्रपति पद के लिए दो उम्मीदवार मैदान में हैं और सांसदों को इनमें से किसी एक को वोट देना होगा।

1991 में BNP और अवामी लीग के उम्मीदवार आमने-सामने थे

बांग्लादेश में 1991 में सेना समर्थित शासन के बाद फिर संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था लागू हुई थी। उसी साल राष्ट्रपति चुनाव में BNP के अब्दुर रहमान बिस्वास और अवामी लीग के उम्मीदवार बदरुल हैदर चौधरी आमने-सामने आए थे।

उस चुनाव में संसद के सदस्यों ने वोट किया और बिस्वास को 172 वोट मिले, जबकि चौधरी को 92 वोट मिले। इसके बाद से अब तक राष्ट्रपति पद के चुनाव में ऐसा मुकाबला नहीं हुआ।

इसके बाद हर बार एक ही उम्मीदवार

1991 के बाद हुए राष्ट्रपति चुनावों में सत्तारूढ़ दल के उम्मीदवार के सामने कोई मजबूत उम्मीदवार मैदान में नहीं उतरा। इसलिए हर बार चुनाव बिना मुकाबले के पूरा हो गया। 2023 में मोहम्मद शहाबुद्दीन को राष्ट्रपति पद के लिए सिर्फ एक ही नामांकन मिला था। इसके बाद उन्हें निर्विरोध राष्ट्रपति घोषित कर दिया गया था।

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