जी हां… सिस्टम चोक है. ऐसा चोक कि आसमान से बरसने वाले पानी को निकलने का रास्ता नहीं मिलता और आम आदमी गटर और बारिश के पानी के कॉकटेल में फंसकर रह जाता है. बारिश वो सौगात है जिसका इंतजार किसान से लेकर शहरों में रहने वाले हर इंसान को रहता है. बादल बरसें, सूखी धरती को राहत मिले, पेड़-पौधों में नई जान आए और फसलों को जीवन मिले. लेकिन हमारे शहरों में बारिश राहत नहीं, आफत लेकर आती है. दो घंटे की लगातार बारिश होते ही महानगरों की रफ्तार थम जाती है. सड़कें तालाब बन जाती हैं, गाड़ियां बंद हो जाती हैं और लोगों के भीतर घर से बाहर निकलने का डर पैदा हो जाता है.
दिल्ली-एनसीआर में भी गुरुवार की सुबह कुछ ऐसी ही थी. रातभर हुई बारिश के बाद नोएडा, गाजियाबाद और दिल्ली की सड़कें पानी में डूब गईं. सबसे हैरानी की बात यह रही कि हालात बिगड़ने के बावजूद कई जगह स्कूल समय पर खुले. गाजियाबाद में प्रशासन ने तब छुट्टी का ऐलान किया जब स्कूल बसें बच्चों को लेकर निकल चुकी थीं. नोएडा में कई स्कूलों ने बच्चों को बुला लिया और बाद में बिजली न होने के कारण समय से पहले छुट्टी करनी पड़ी. सवाल यही है कि जब मौसम विभाग पहले से भारी बारिश की चेतावनी दे चुका था तो समय रहते फैसला क्यों नहीं लिया गया?
कहीं ट्रैफिक जाम, कहीं करंट से मौत
गाजियाबाद की तस्वीरें सिस्टम की हकीकत बयान कर रही थीं. वसुंधरा और इंदिरापुरम जैसे पॉश इलाकों में करोड़ों रुपये के फ्लैट हैं, लेकिन पहली बारिश के बाद सारी चमक फीकी पड़ गई. सड़कें नालों में बदल गईं. कार, बाइक, बस और पैदल चलने वाले सभी लोग गटर और बारिश के पानी से जूझते नजर आए. इंदिरापुरम में एक की करेंट से मौत की भी खबर सामने आयी. एमिटी स्कूल की एक बस सड़क पर फंस गई जिसे लोगों ने धक्का देकर बाहर निकाला. राहत की बात सिर्फ इतनी थी कि उस समय बस में बच्चे नहीं थे. वहीं दूसरी ओर एक ऑटो बीच सड़क पर बंद हो गया और छोटे-छोटे स्कूली बच्चे उसे धक्का लगाते दिखाई दिए. यह दृश्य केवल एक तस्वीर नहीं, बल्कि प्रशासनिक तैयारी पर बड़ा सवाल था.
नोएडा, जिसे आधुनिक और प्लांड सिटी होने का दावा किया जाता है, वहां भी हालात अलग नहीं थे. फादर एग्नेल स्कूल के बाहर सड़क नदी में बदल चुकी थी. बच्चे स्कूल पहुंच चुके थे, लेकिन एक घंटे बाद बिजली गुल होने की वजह से अचानक छुट्टी का संदेश भेज दिया गया. सुबह ऑफिस जाने वाले लोग घंटों ट्रैफिक में फंसे रहे. कई गाड़ियां पानी में बंद हो गईं और लोग सड़क पर बहते पानी में रास्ता तलाशते रहे.
बार-बार यही कहा जाता है कि दिल्ली-एनसीआर का ड्रेनेज सिस्टम पुराना है. यह बात सही भी है. दिल्ली का मौजूदा ड्रेनेज सिस्टम करीब 50 साल पहले तैयार किया गया था. उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 1976 के ड्रेनेज मास्टर प्लान को उस समय की आबादी और 24 घंटे में 50 मिलीमीटर बारिश के हिसाब से डिजाइन किया गया था. लेकिन सवाल यह है कि 8 जुलाई को दिल्ली में सिर्फ 26 मिलीमीटर बारिश हुई, यानी सिस्टम की क्षमता से भी कम बारिश, फिर भी सदर बाजार से लेकर सांसदों के आवासों तक जलभराव क्यों हो गया? इसका सीधा मतलब है कि समस्या सिर्फ पुराने ड्रेनेज की नहीं, बल्कि उसकी देखरेख, सफाई और समय पर रखरखाव की भी है.
दिल्ली में सुबह मौसम विभाग ने तीन घंटे के लिए रेड अलर्ट जारी किया था. इसके बावजूद राजघाट, बीडी मार्ग, लक्ष्मी नगर और सदर बाजार जैसे इलाकों में सीवर ओवरफ्लो करते दिखाई दिए. राजघाट के पास गटर का पानी सड़क पर बह रहा था. लक्ष्मी नगर में सुबह सात बजे से पहले ही ट्रैफिक रेंगने लगा. कई जगह अभिभावकों को छोटे बच्चों को गोद में उठाकर पानी से भरी सड़क पार करानी पड़ी.
दिल्ली सरकार का कहना है कि जलभराव से निपटने के लिए कंट्रोल रूम बनाया गया है और हालात पहले से बेहतर हैं. यह भी सच है कि इस बार मिंटो रोड और प्रह्लादपुर अंडरपास जैसे कुछ स्थान, जो हर साल डूब जाते थे, वहां पहले जैसी स्थिति नहीं बनी. यानी सुधार की कोशिशें हुई हैं. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि पहली बड़ी बारिश ने फिर साबित कर दिया कि अलग-अलग एजेंसियों के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा भी एक बड़ी समस्या है. दिल्ली में ड्रेनेज और सीवेज व्यवस्था एमसीडी, एनडीएमसी, पीडब्ल्यूडी, डीडीए और दिल्ली जल बोर्ड जैसी कई एजेंसियों के बीच बंटी हुई है. जब जवाबदेही बंट जाती है तो जवाब भी कहीं खो जाता है.
हालात सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं हैं. मौसम का मिजाज भी तेजी से बदल रहा है. जलवायु परिवर्तन की वजह से अब “न्यू नॉर्मल” शब्द इस्तेमाल किया जा रहा है. यानी मौसम का पुराना पैटर्न अब बदल चुका है. अब गर्मी पड़ेगी तो रिकॉर्ड तोड़ पड़ेगी, बारिश होगी तो कम समय में मूसलाधार होगी और सर्दी आएगी तो सामान्य से ज्यादा ठंड लेकर आएगी. यही वजह है कि पहाड़ों में अचानक बादल फटने और नालों में उफान जैसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं.
उत्तराखंड में कई जगह उफनते नालों के बीच लोगों को जान जोखिम में डालकर रास्ता पार करना पड़ा. एक व्यक्ति अपनी पीठ पर छोटे बच्चे को कपड़े से बांधकर तेज बहाव वाले नाले को पार करता दिखाई दिया. यह तस्वीर बताती है कि मौसम की मार अब कितनी खतरनाक होती जा रही है.ॉ
देशभर से हैरान करने वाली तस्वीर
महाराष्ट्र के रायगढ़ से भी हैरान करने वाली तस्वीर सामने आई. भारी बारिश के बाद पातालगंगा नदी में हजारों एलपीजी गैस सिलेंडर बहते दिखाई दिए. दरअसल गोदाम में पानी भर जाने के कारण करीब तीन हजार सिलेंडर नदी में बह गए. प्रशासन को लोगों से अपील करनी पड़ी कि अगर किसी को सिलेंडर मिले तो उसे वापस किया जाए.
उत्तराखंड में अगले 48 घंटे के लिए भारी से बहुत भारी बारिश का अलर्ट जारी किया गया है. देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल और चंपावत समेत कई जिलों में मौसम विभाग ने चेतावनी दी है. मॉनसून की शुरुआत में ही 71 सड़कें बंद हो चुकी हैं और आने वाले दिनों में हालात और चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं.
सीधे शब्दों में कहें तो दिल्ली, नोएडा और गाजियाबाद से लेकर पहाड़ों तक एक ही तस्वीर दिखाई दे रही है. बारिश समस्या नहीं है, समस्या है उसकी तैयारी का अभाव. हर साल मॉनसून आने से पहले नालों की सफाई, ड्रेनेज व्यवस्था और जलनिकासी की योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं. लेकिन पहली ही तेज बारिश उन दावों की पोल खोल देती है.
सरकारों को ड्रेनेज सिस्टम को आधुनिक बनाने, एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने और समय रहते निर्णय लेने होंगे. वहीं नागरिकों को भी नालों में कूड़ा फेंकने जैसी आदतों से बचना होगा. क्योंकि जब तक प्रशासनिक तैयारी और नागरिक जिम्मेदारी दोनों साथ नहीं आएंगे, तब तक हर बरसात में शहरों की यही तस्वीर सामने आती रहेगी- बारिश कम और सिस्टम की नाकामी ज्यादा दिखाई देगी.


