वॉशिंगटन डीसी9 मिनट पहले
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अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प 2019 से कई बार ग्रीनलैंड पर कंट्रोल करने की बात कह चुके हैं।
अमेरिकी प्रशासन ने एक बार फिर ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की बात कही है। BBC के मुताबिक व्हाइट हाउस की प्रवक्ता कैरोलीन लेविट ने मंगलवार को इसे अमेरिकी सुरक्षा के लिए अहम बताया। उन्होंने कहा कि उनकी टीम इसे साकार करने के कई तरीके तलाश रही है, जिनमें सैन्य बल का इस्तेमाल भी शामिल है।
इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कई बार ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की बात कह चुके हैं। ट्रम्प ने सोमवार को कहा था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड बहुत जरूरी है। वहां पर रूसी और चीनी जहाजों की मौजूदगी चिंता की बात है। उन्होंने कहा था कि वह 20 दिन में ग्रीनलैंड पर बात करेंगे।
ग्रीनलैंड, डेनमार्क का एक स्वायत्त इलाका है, जो NATO का हिस्सा भी है। यहां पर डेनमार्क के करीब 200 सैनिक तैनात हैं।

अमेरिकी विदेश मंत्री बोले- डेनमार्क से ग्रीनलैंड खरीदना चाहते
ट्रम्प के वरिष्ठ सलाहकार स्टीफन मिलर ने CNN को दिए इंटरव्यू में कहा कि अमेरिकी सरकार चाहती है कि ग्रीनलैंड अमेरिका का हिस्सा हो और कोई भी देश ग्रीनलैंड के भविष्य पर अमेरिका से सैन्य टक्कर नहीं लेगा।
वहीं, रॉयटर्स के मुताबिक अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने बताया कि प्रशासन का इरादा ग्रीनलैंड पर हमला करने का नहीं है, बल्कि डेनमार्क से इसे खरीदने का है। एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि विकल्पों में सीधे खरीद या ग्रीनलैंड के साथ विशेष समझौता शामिल है और अमेरिका ग्रीनलैंड के लोगों के साथ फायदेमंद रिश्ते बनाना चाहता है।
ग्रीनलैंड में सिर्फ 57 हजार लोग रहते हैं, जो 1979 से काफी हद तक स्वशासी है, लेकिन रक्षा और विदेश नीति डेनमार्क के हाथ में है।
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रम्प की इच्छा को मजाक माना था
ट्रम्प के पहले कार्यकाल में ग्रीनलैंड को लेकर ट्रम्प की इच्छा को मजाक समझा गया था। CNN के मुताबिक, ग्रीनलैंड पर कंट्रोल की बात को राष्ट्रपति की बेफिजूल बकवास माना गया।
पिछले साल, डोनाल्ड ट्रम्प जूनियर और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ग्रीनलैंड की औपचारिक यात्रा की थी। इस समय भी अमेरिका की ट्रोलिंग की गई थी।
यूरोपीय नेताओं ने मंगलवार को कहा कि अब वे ट्रम्प की धमकियों को गंभीरता से ले रहे हैं। वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अगवा करने के बाद ट्रम्प सरकार अब पूरे वेस्टर्न हेमिसफेयर को ट्रम्प का इलाका मानने लगी है।
ट्रम्प प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी स्टीफन मिलर ने सोमवार को CNN पर कहा कि अमेरिका अब ताकत से चलने वाली नियमों का पालन कर रहा है।

अमेरिका के उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस पिछले साल ग्रीनलैंड के अमेरिकी बेस पर गए थे।
ग्रीनलैंड की अपनी सेना नहीं, अमेरिका और डेनमार्क के सैनिक तैनात
ग्रीनलैंड की अपनी कोई सेना नहीं है। उसकी रक्षा और विदेश नीति की जिम्मेदारी डेनमार्क की है। यह डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है। यहां का अबादी महज 57 हजार है।
2009 के बाद, ग्रीनलैंड सरकार को तटीय सुरक्षा और कुछ विदेशी मामलों में छूट मिली है, लेकिन रक्षा और विदेश नीति के मुख्य मामले अभी भी डेनमार्क के पास हैं।
अमेरिकी सैनिक: अमेरिका का पिटुफिक स्पेस बेस (थुले एयर बेस)। ग्रीनलैंड के उत्तर-पश्चिम में स्थित यह बेस अमेरिका चलाता है। यह बेस मिसाइल चेतावनी सिस्टम और स्पेस मॉनिटरिंग के लिए इस्तेमाल होता है। NYT के मुताबिक यहां करीब 150 से 200 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। ये मिसाइल चेतावनी, स्पेस निगरानी और आर्कटिक सुरक्षा के लिए हैं। यह अमेरिका का सबसे उत्तरी सैन्य अड्डा है।
डेनिश सैनिक: डेनमार्क की जॉइंट आर्कटिक कमांड ग्रीनलैंड में काम करती है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यहां कुल करीब 150 से 200 डेनिश सैन्य और सिविलियन कर्मी हैं। जो निगरानी, सर्च एंड रेस्क्यू, और संप्रभुता की रक्षा करते हैं। इसमें प्रसिद्ध सीरियस डॉग स्लेज पेट्रोल (एक छोटी एलीट यूनिट, करीब 12-14 लोग) भी शामिल है, जो कुत्तों की स्लेज से लंबी गश्त करती है।

ग्रीनलैंड में स्थित पिटुफिक एयरबेस, जिसे पहले थुले वायु अड्डा के नाम से जाना जाता था
यूरोपीय देशों ने आपत्ति जताई, कहा- ग्रीनलैंड उसके लोगों का है
यूरोपीय देशों ने व्हाइट हाउस के बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन और डेनमार्क के नेताओं ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि ग्रीनलैंड उसके लोगों का है और केवल डेनमार्क और ग्रीनलैंड ही इसके भविष्य का फैसला कर सकते हैं।
उन्होंने आर्कटिक सुरक्षा को नाटो के सभी सदस्यों के साथ मिलकर मजबूत करने की बात कही, लेकिन संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों जैसे संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने पर जोर दिया।
डेनमार्क PM बोली- अगर हमला किया तो कुछ नहीं बचेगा
वहीं, डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसन ने कहा है कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की कोशिश की तो NATO सैन्य गठबंधन का अंत हो जाएगा।
सोमवार रात एक टीवी इंटरव्यू में फ्रेडरिकसन ने कहा कि अगर अमेरिका किसी NATO सदस्य देश पर सैन्य कार्रवाई करता है, तो NATO की पूरी व्यवस्था ही खत्म हो जाएगी। कुछ भी नहीं बचेगा।NATO में एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना जाता है।
फ्रेडरिक्सेन ने ट्रम्प से करीबी सहयोगी देश के खिलाफ धमकियां देना बंद करने की अपील की और याद दिलाया कि ग्रीनलैंड के लोग खुद स्पष्ट कह चुके हैं कि वे बिकाऊ नहीं हैं।
ग्रीनलैंड PM बोले- बातचीत सम्मानजनक तरीके से होनी चाहिए
ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नीलसन ने भी यूरोपीय नेताओं के बयान का स्वागत किया और कहा कि बातचीत सम्मानजनक तरीके से होनी चाहिए।
नीलसन ने कहा कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति ग्रीनलैंड को वेनेजुएला से जोड़कर सैन्य हस्तक्षेप की बात करते हैं, तो यह न केवल गलत है बल्कि हमारे लोगों के प्रति अनादर है।
नीलसन ने 4 जनवरी को बयान जारी कर कहा- मैं शुरू से ही शांत और स्पष्ट रूप से यह कहना चाहता हूं कि घबराहट या चिंता का कोई कारण नहीं है। केटी मिलर के पोस्ट से, जिसमें ग्रीनलैंड को अमेरिकी झंडे में लिपटा हुआ दिखाया गया है, इससे कुछ भी नहीं बदलता।

डेनमार्क और अमेरिका दोनों ही NATO मेंबर
डेनमार्क और ग्रीनलैंड, डेनमार्क साम्राज्य का हिस्सा हैं और नाटो का सदस्य हैं, जिससे इसकी रक्षा की जिम्मेदारी नाटो की सामूहिक सुरक्षा के तहत आती है।
अमेरिका का डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ रिश्ता करीबी और सहयोगी का है। डेनमार्क नाटो का संस्थापक सदस्य है। 1951 के रक्षा समझौते से अमेरिका को ग्रीनलैंड में सैन्य आधार रखने की अनुमति है। दोनों देश सुरक्षा, विज्ञान, पर्यावरण और व्यापार में सहयोग करते हैं।

यूरोपीय नेता बोले- हर देश की आजादी का सम्मान करना चाहिए
यूरोप के कई बड़े देशों के नेताओं ने बताया कि NATO पहले ही कह चुका है कि आर्कटिक क्षेत्र उसके लिए अहम है। इसी वजह से यूरोपीय देश वहां अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं। आर्कटिक को सुरक्षित रखने और किसी भी खतरे को रोकने के लिए वहां ज्यादा गतिविधियां और निवेश किए जा रहे हैं। डेनमार्क और उसके साथ ग्रीनलैंड भी NATO का हिस्सा हैं।
बयान में कहा गया है कि आर्कटिक की सुरक्षा सभी देशों को मिलकर करनी होगी। यह काम NATO के दूसरे देशों, खासकर अमेरिका के साथ मिलकर किया जाएगा। इसमें संयुक्त राष्ट्र के नियमों का पालन किया जाएगा, जिनमें हर देश की आजादी, उसकी जमीन की सुरक्षा और उसकी सीमाओं का सम्मान शामिल है।
उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका इस पूरे काम में एक अहम साझेदार है। यह साझेदारी NATO के जरिए और डेनमार्क और अमेरिका के बीच 1951 में हुए रक्षा समझौते के तहत है।
जानिए अमेरिका को ग्रीनलैंड से क्या फायदा
- खास भौगोलिक स्थिति: ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति बहुत खास है। यह उत्तर अमेरिका और यूरोप के बीच, यानी अटलांटिक महासागर के बीचों-बीच के पास स्थित है। इसी वजह से इसे मिड-अटलांटिक क्षेत्र में एक बेहद अहम ठिकाना माना जाता है।
- रणनीतिक सैन्य महत्व: ग्रीनलैंड यूरोप और रूस के बीच सैन्य और मिसाइल निगरानी के लिए बेहद अहम है। यहां अमेरिका का थुले एयर बेस पहले से है, जो मिसाइल चेतावनी और रूसी/चीनी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए जरूरी है।
- चीन और रूस पर नजर: आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की गतिविधियां बढ़ रही हैं। ग्रीनलैंड पर प्रभाव होने से अमेरिका इस इलाके में अपनी भू-राजनीतिक पकड़ मजबूत रखना चाहता है।
- प्राकृतिक संसाधन: ग्रीनलैंड में दुर्लभ खनिज, तेल, गैस और रेयर अर्थ एलिमेंट्स के बड़े भंडार माने जाते हैं, जिनका भविष्य में आर्थिक और तकनीकी महत्व बहुत ज्यादा है। चीन इनका 70-90% उत्पादन नियंत्रित करता है, इसलिए अमेरिका अपनी निर्भरता कम करना चाहता है।
- नई समुद्री व्यापारिक राहें: ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है, जिससे नई शिपिंग रूट्स खुल रही हैं। ग्रीनलैंड का नियंत्रण अमेरिका को इन रूटों पर प्रभुत्व और आर्कटिक क्षेत्र में रूस-चीन की बढ़त रोकने में मदद करेगा।
- अमेरिकी सुरक्षा नीति: अमेरिका ग्रीनलैंड को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की “फ्रंट लाइन” मानता है। वहां प्रभाव बढ़ाकर वह भविष्य के संभावित खतरों को पहले ही रोकना चाहता है।
ग्रीनलैंड से दुश्मनों पर हमला करता था जर्मनी
दूसरे विश्व युद्ध के समय उस दौर के लड़ाकू और निगरानी विमान बहुत दूर तक उड़ान नहीं भर पाते थे। यूरोप और उत्तरी अमेरिका के तटों से उड़ने वाले विमान अटलांटिक महासागर के बीच के एक बड़े हिस्से तक नहीं पहुंच पाते थे। इसी इलाके को ‘ग्रीनलैंड एयर गैप’ कहा गया।
इस एयर गैप का मतलब था कि समुद्र का यह हिस्सा हवाई निगरानी से लगभग खाली रहता था। वहां न मित्र देशों के विमान गश्त कर सकते थे और न ही दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती थी।
जर्मनी ने इसी कमजोरी का फायदा उठाया। उसकी पनडुब्बियां, जिन्हें यू-बोट कहा जाता था। यह इसी इलाके में छिपकर चलती थीं। वे अमेरिका और यूरोप के बीच सामान, हथियार और सैनिक ले जा रहे मित्र देशों के जहाजों पर अचानक हमला कर देती थीं।
ऊपर से हवाई सुरक्षा नहीं थी, इसलिए इन जहाजों को बचाना मुश्किल हो जाता था। इस वजह से यह इलाका मित्र देशों के लिए बेहद खतरनाक बन गया और इसे जहाजों का “किलिंग ग्राउंड” यानी मौत का मैदान तक कहा जाने लगा।
युद्ध के दौरान जैसे-जैसे ग्रीनलैंड और आसपास के इलाकों में हवाई अड्डे और सैन्य ठिकाने बने, वैसे-वैसे इस एयर गैप को खत्म किया गया। इससे मित्र देशों को पूरे अटलांटिक पर हवाई निगरानी और सुरक्षा मिल सकी।
दूसरे विश्व युद्ध के 8 दशक बाद ग्रीनलैंड अहम हो चुका है। अगर भविष्य में कोई बड़ा युद्ध होता है, तो ग्रीनलैंड पर नियंत्रण रखने वाला देश अटलांटिक समुद्री रास्तों पर भी पकड़ बना सकते हैं।
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