वॉशिंगटन डीसी2 घंटे पहले
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डिएगो गार्सिया हिंद महासागर में मौजूद चागोस आइलैंड्स का हिस्सा है, जिस पर 210 साल से ब्रिटेन का कब्जा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने डिएगो गार्सिया आइलैंड को लेकर ब्रिटेन पर नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन इस द्वीप को मॉरीशस को देने की तैयारी कर रहा है, जबकि यहां अमेरिका का बेहद अहम सैन्य अड्डा मौजूद है। ट्रम्प के मुताबिक बिना किसी ठोस वजह के यह द्वीप देना गलत और बेवकूफी भरा फैसला है।
डिएगो गार्सिया, हिंद महासागर में स्थित चागोस आइलैंड्स का हिस्सा है। ब्रिटेन ने 1814 में नेपोलियन को हराकर चागोस आइलैंड्स पर कब्जा किया था। 1965 में इन्हें मॉरीशस से अलग कर ‘ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र’ बनाया गया।
1968 में मॉरीशस को आजादी मिली थी। तब तय हुआ था कि जब इन द्वीपों की जरूरत रक्षा के लिए नहीं रहेगी, तो इन्हें मॉरीशस को लौटा दिया जाएगा। बाद में डिएगो गार्सिया पर अमेरिका और ब्रिटेन का जॉइंट मिलिट्री बेस बनाया गया।

ट्रम्प बोले- रूस-चीन ने कमजोरी को भांप लिया है
ट्रम्प ने सोशल मीडिया ट्रुथ सोशल पर कहा कि-
हैरानी की बात है कि हमारा शानदार NATO सहयोगी ब्रिटेन इस समय डिएगो गार्सिया द्वीप मॉरीशस को सौंपने की योजना बना रहा है। वो भी बिना किसी कारण के। इसमें कोई शक नहीं है कि चीन और रूस ने इस कमजोरी को भांप लिया है।

उन्होंने आगे लिखा कि ये देश सिर्फ ताकत को समझते हैं और इसी वजह से उनकी लीडरशिप में अमेरिका को एक साल में पहले से कहीं ज्यादा सम्मान मिला है।
ट्रम्प ने कहा कि इतना अहम इलाका सौंपना बहुत बड़ी बेवकूफी है। यह फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दों में से एक है, जिसके चलते अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड हासिल करना जरूरी हो जाता है।

मॉरीशस को 1968 में ब्रिटेन से आजादी मिली थी। उस वक्त भी चागोस आइलैंड्स पर ब्रिटेन का कब्जा बना रहा।
मॉरीशस 50 साल से इन आइलैंड्स का अधिकार मांग रहा
मॉरीशस 1980 के दशक से इन आइलैंड्स पर अपना अधिकार मांगता रहा है और उसने यह मामला अंतरराष्ट्रीय अदालतों में उठाया। साल 2019 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने एक फैसले में कहा कि 1968 में मॉरीशस को आजादी देते वक्त उपनिवेश खत्म करने की प्रोसेस पूरी नहीं हुई थी और ब्रिटेन को जल्द से जल्द चागोस आइलैंड्स का प्रशासन खत्म करना चाहिए।
ऋषि सुनक के लीडरशिप वाली कंजरवेटिव सरकार ने 2022 में ऐलान किया कि ब्रिटेन और मॉरीशस चागोस आइलैंड्स की संप्रभुता को लेकर बातचीत शुरू करेंगे।
सरकार ने कहा कि सुरक्षा और कानूनी विवादों से बचने के लिए स्थिति साफ करना जरूरी था, ताकि डिएगो गार्सिया में ब्रिटेन-अमेरिका का मिलिट्री बेस बिना रुकावट चलता रहे। इसी कारण जुलाई 2024 के चुनाव से पहले मॉरीशस से 11 दौर की बातचीत हुई।
ब्रिटेन और मॉरीशस ने 2024 में समझौते पर साइन किए
ब्रिटिश पीएम कीर स्टार्मर की लेबर पार्टी के सत्ता में आने के बाद 3 अक्टूबर 2024 को दोनों देशों ने एक जॉइंट स्टेटमेंट जारी किया और बताया कि राजनीतिक समझौता हो गया है। कीर स्टार्मर और मॉरीशस के प्रधानमंत्री नवीन रामगुलाम ने 22 मई 2025 को इस संधि पर हस्ताक्षर किए।
स्टार्मर ने कहा कि अगर मॉरीशस कानूनी कार्रवाई करता, तो ब्रिटेन के पास जीतने का कोई ठोस मौका नहीं होता और कुछ ही हफ्तों में अंतरिम आदेश आ सकता था। उन्होंने यह भी कहा कि बिना समझौते के ब्रिटेन के पास इस बात को रोकने का भी कानूनी आधार नहीं होता कि चीन या दूसरे देश चागोस आइलैंड पर मिलिट्री एक्टिविटी न करें।
इस समझौते पर अमेरिका ने कहा कि सभी विभागों की जांच के बाद यह तय किया गया है कि यह समझौता डिएगो गार्सिया में अमेरिका और ब्रिटेन के जॉइंट मिलिट्री बेस को लंबे समय तक सुरक्षित और ठीक से चलाने में मदद करेगा।
फरवरी 2025 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री से मुलाकात के दौरान ट्रम्प ने कहा था कि वह इस समझौते के साथ आगे बढ़ने के पक्ष में हैं और उन्हें लगता है कि यह ठीक से काम करेगा।

ब्रिटेन के पास 99 साल की लीज पर रहेगा डिएगो गार्सिया
हालांकि विपक्षी कंजरवेटिव पार्टी ने इस समझौते की आलोचना की और इसे आत्मसमर्पण बताया। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन अपना इलाका सौंप रहा है और इसके लिए 30 अरब पाउंड (3.49 लाख करोड़ रुपए) से ज्यादा की रकम दे रहा है।
विपक्षी नेता जेम्स कार्ट्रिज ने कहा कि उनकी सरकार ने ऐसा कोई समझौता नहीं किया क्योंकि वे अपनी ही जमीन को वापस किराये पर लेने के लिए अरबों पाउंड देने के खिलाफ हैं।
इस समझौते के तहत मॉरीशस को द्वीपों की संप्रभुता मिलेगी, लेकिन ब्रिटेन डिएगो गार्सिया को 99 साल की लीज पर अपने पास रखेगा, जिसे आगे बढ़ाने का ऑप्शन भी होगा। इसके लिए ब्रिटेन पमेंट करेगा।
शुरुआती 99 साल में हर साल औसतन 101 मिलियन पाउंड (1173 करोड़ रुपए) खर्च होने का अनुमान है। कुल खर्च करीब 3.4 अरब पाउंड (40 हजार करोड़ रुपए) बताया गया है, हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि यह इससे ज्यादा भी हो सकता है।

मॉरीशस और ब्रिटेन के बीच जो समझौता हुआ है उसके तहत डिएगो गार्सिया 99 साल ब्रिटेन के पास लीज पर रहेगा।
बदलती जियो पॉलिटिक्स में भारत के लिए जरूरी चागोस आइलैंड
ORF रिसर्च फाउंडेशन के मुताबिक, तेजी से बदलती भू राजनीतिक स्थितियों के बीच भारत के लिए मॉरीशस और चागोस आइलैंड का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। भारत ने 23 मई 2025 को ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच हुए उस समझौते का स्वागत किया था, जिसके तहत चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता मॉरीशस को दी जा रही है।
पिछले 10 सालों में भारत सरकार ने विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय में हिंद महासागर क्षेत्र के लिए अलग डिवीजन बनाया है, जिसे इंडियन ओशन रीजन डिवीजन कहा जाता है।
इस डिवीजन में अब मॉरीशस, सेशेल्स, मेडागास्कर, कोमोरोस, फ्रांस का रीयूनियन द्वीप, श्रीलंका और मालदीव शामिल हैं। इससे साफ होता है कि भारत इस क्षेत्र को बहुत अहम मानता है।
भारत के लिए चागोस जरूरी क्यों…
- चागोस आइलैंड हिंद महासागर के बीच में है, इसलिए यह भारत के समुद्री रास्तों और व्यापार की सुरक्षा के लिए काफी अहम माना जाता है।
- डिएगो गार्सिया द्वीप पर अमेरिका और ब्रिटेन का सैन्य अड्डा है, जिससे पूरे हिंद महासागर पर नजर रखी जाती है और इसका फायदा भारत की समुद्री सुरक्षा को भी मिलता है।
- यहां मौजूद अमेरिकी सेना चीन की हिंद महासागर में बढ़ती गतिविधियों पर एक तरह से रोक लगाने का काम करती है, जो भारत के लिए फायदेमंद है।
- इस इलाके से मिलने वाली निगरानी और खुफिया जानकारी भारत को समुद्र में होने वाली गतिविधियों को बेहतर तरीके से समझने में मदद करती है।
- हिंद महासागर में शांति और स्थिरता बनी रहना भारत की Indo-Pacific नीति और SAGAR विजन के लिए बहुत जरूरी है।
चीन इस इलाके में तेजी से अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा
पिछले 10 से 15 सालों में चीन ने हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी आर्थिक और सैन्य मौजूदगी तेजी से बढ़ाई है। चीन ने वॉरशिप भेजे हैं, समुद्री सुरक्षा ऑपरेशन में हिस्सा लिया है और कई अहम नौसैनिक ठिकानों तक पहुंच बनाई है। उसने इस पूरे क्षेत्र में दर्जनों बंदरगाहों में इन्वेस्टमेंट किया है, जिनमें से कई ऐसे हैं जहां सैन्य जहाज भी रुक सकते हैं।
ब्लूमबर्ग की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की यह बढ़ती ताकत भारत के लिए चिंता का कारण है। भारत ने मॉरीशस के अगालेगा आइलैंड पर एक हवाई पट्टी बनाई है, ताकि वहां से टोही विमान उड़ाकर चीनी एक्टिविटी पर नजर रख सकें।
हिंद महासागर अफ्रीका के हॉर्न से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैला हुआ है। इस क्षेत्र में करीब 3 अरब लोग रहते हैं और दुनिया का लगभग 40% समुद्री तेल इसी रास्ते से गुजरता है। दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में से कई इसी महासागर में हैं, जो यूरोप, एशिया, अफ्रीका और मिडिल ईस्ट को जोड़ते हैं।

भारत ने मुंबई से 3,729 किमी दूर मॉरिशस के उत्तरी अगालेगा द्वीप पर मिलिट्री बेस के लिए जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाया है।
भारत, चीन और अमेरिका तीनों मॉरीशस में असर बढ़ा रहे
मॉरीशस एक आर्थिक रूप से मजबूत और लोकतांत्रिक देश है, जिसका समुद्री क्षेत्र बहुत बड़ा है। भारत, चीन और अमेरिका तीनों ही यहां अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
भारत ने मॉरीशस में मेट्रो लाइन, सुप्रीम कोर्ट और अस्पताल जैसे बड़े प्रोजेक्ट बनाए हैं। वहीं चीन ने हवाई अड्डा टर्मिनल, बांध, स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स और क्रूज टर्मिनल जैसे कई निर्माण किए हैं। मॉरीशस चीन के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) करने वाला पहला अफ्रीकी देश भी बना।
मॉरीशस के विदेश मंत्री ने 2025 में कहा था कि मौजूदा हालात उनके देश के लिए फायदेमंद हैं, क्योंकि अब कोई भी बड़ी शक्ति छोटे देशों को नजरअंदाज नहीं कर सकती। मॉरीशस किसी एक देश तक सीमित नहीं है और सभी के साथ रिश्ते रखने के लिए खुला है।
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