मैड्रिड3 घंटे पहले
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पैंक्रियाटिक कैंसर के 90% मरीज 5 साल भी नहीं जी पाते हैं। (इनसेट- रिसर्च टीम को लीड करने वाले वैज्ञानिक मारियानो बार्बासिड)
स्पेन के वैज्ञानिकों ने पैंक्रियाटिक कैंसर का इलाज खोजने का दावा किया है। करीब 6 साल तक चूहों पर चली रिसर्च में उन्होंने तीन दवाओं को मिलाकर एक नई थेरेपी तैयार की, जिससे पैंक्रियाज का ट्यूमर पूरी तरह खत्म हो गया। इलाज के बाद चूहों में कैंसर दोबारा नहीं लौटा।
यह रिसर्च ‘नेशनल कैंसर रिसर्च सेंटर’ के वैज्ञानिक ‘मारियानो बार्बासिड’ की अगुवाई में की गई। इसके नतीजे 27 जनवरी को ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ (PNAS) जर्नल में प्रकाशित हुए।
पैंक्रियाटिक कैंसर को सबसे खतरनाक कैंसरों में माना जाता है, क्योंकि इसके लक्षण बहुत देर से सामने आते हैं। ज्यादातर मामलों में बीमारी तब पकड़ में आती है, जब वह काफी बढ़ चुकी होती है। इसी वजह से इसके सिर्फ 10% मरीज ही 5 साल तक जिंदा रह पाते हैं। एपल के CEO स्टीव जॉब्स की 2011 में इसी से मौत हुई थी।

वैज्ञानिकों ने एक साथ तीन दवाओं का इस्तेमाल किया
इस नई थेरेपी में वैज्ञानिकों ने एक साथ तीन दवाओं (जेमसिटाबीन, ऑल-ट्रांस रेटिनोइक एसिड (ATRA) और नेराटिनिब) का इस्तेमाल किया। इसका मकसद कैंसर के बचने के कई रास्तों को एक साथ बंद करना था। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इससे कैंसर सेल्स खुद को बदल नहीं पाईं और इलाज असरदार साबित हुआ।
मारियानो बार्बासिड पहले भी कह चुके हैं कि पैंक्रियाटिक कैंसर को एक दवा से खत्म नहीं किया जा सकता। उनका मानना है कि यह कैंसर बहुत तेजी से खुद को ढाल लेता है और इसे रोकने के लिए कई रास्तों पर एक साथ हमला करना जरूरी है।
रिसर्च के मुताबिक, ये तीनों दवाएं मिलकर कैंसर पर अलग-अलग तरीकों से हमला करती हैं। जेमसिटाबीन तेजी से बढ़ने वाली कैंसर सेल्स को मारती हैं। ATRA ट्यूमर के चारों ओर बनी सुरक्षात्मक परत को कमजोर करती है। नेराटिनिब उन सिगनल्स को रोकती है, जिनसे ट्यूमर को बढ़ने की ताकत मिलती है।
तीनों दवाओं के साथ इस्तेमाल से कैंसर की सुरक्षा टूट गई और इलाज के बाद कैंसर दोबारा नहीं लौटा। जो वैज्ञानिक इस रिसर्च से जुड़े नहीं थे, उन्होंने भी कहा कि पैंक्रियाटिक कैंसर के मामलों में दोबारा बीमारी लौटे बिना ऐसे नतीजे बहुत कम देखने को मिलते हैं।
पैंक्रियाटिक कैंसर क्या है?
हमारे पेट के पिछले हिस्से में एक मछली जैसा ऑर्गन होता है। खास बात ये है कि ये ऑर्गन और ग्लैंड दोनों है। ये ऐसे एंजाइम और हॉर्मोन रिलीज करता है, जिससे हमारा शरीर स्वस्थ रहता है।
पैंक्रियाज की सेल्स शरीर की सभी सेल्स की तरह एक निश्चित पैटर्न में बढ़ती और नष्ट होती हैं। डेड सेल्स को हेल्दी सेल्स खाकर खत्म कर देती हैं। कैंसर होने पर ये पैटर्न को तोड़कर कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ने लगती हैं और मल्टीप्लाई होने लगती हैं। यही पैंक्रियाटिक कैंसर है।
पैंक्रियाटिक कैंसर का सबसे खतरनाक पहलू ये है कि इसमें शुरुआती स्टेज में कोई लक्षण नजर नहीं आता है। इसके लक्षण आमतौर पर तब सामने आते हैं, जब ट्यूमर पाचन तंत्र के दूसरे अंगों को भी प्रभावित करना शुरू कर देता है।

दो तरह का होता है पैंक्रियाटिक कैंसर
मेडिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, पैंक्रियाटिक कैंसर मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है। दोनों की प्रकृति, बढ़ने की रफ्तार व इलाज की रणनीति अलग-अलग होती है।
1. एक्सोक्राइन पैंक्रियाटिक कैंसर (EPC)
पैंक्रियाटिक कैंसर का सबसे सामान्य प्रकार एक्सोक्राइन पैंक्रियाटिक कैंसर (EPC) होता है। यह ज्यादातर पैंक्रियाज की नलिकाओं (डक्ट्स) में विकसित होता है।
डॉक्टरों का कहना है कि यह कैंसर तेजी से फैलने की क्षमता रखता है, इसलिए समय पर पहचान और इलाज बहुत जरूरी होता है। अधिकतर पैंक्रियाटिक कैंसर के मामले इसी कैटेगिरी में आते हैं।
2. एंडोक्राइन पैंक्रियाटिक कैंसर (NETs)
दूसरा प्रकार न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर (NET) कहलाता है। यह पैंक्रियाज की उन सेल्स से बनता है जो शरीर में हार्मोन बनाने का काम करती हैं।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह कैंसर अपेक्षाकृत धीमी गति से बढ़ता है और एक्सोक्राइन कैंसर की तुलना में कम आक्रामक माना जाता है। हालांकि यह दुर्लभ है, फिर भी इसके लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
पैंक्रियाटिक कैंसर का इलाज संभव है?
पैंक्रियाटिक कैंसर में सर्वाइवल रेट बहुत कम होता है, लेकिन अगर शुरुआती स्टेज में इसका पता लगा लिया जाए तो ट्रीटमेंट से इससे छुटकारा मिल सकती है। पैंक्रियाटिक कैंसर पूरी तरह से ठीक करने का मतलब है कि इसका सर्जिकल रिमूवल करना होगा।
पैंक्रियाटिक कैंसर के क्या-क्या इलाज हैं…
- सर्जरी: अगर कैंसर पैंक्रियाज के अलावा किसी अंग में नहीं फैला है और कैंसर को पूरी तरह बाहर निकालना संभव है।
- व्हिपल प्रोसीजर: अगर पैंक्रियाज के ऊपरी सिरे पर कैंसरस ट्यूमर है तो पैंक्रियाज का ऊपरी सिरा निकाल दिया जाता है।
- डिस्टल पैंक्रियाटेक्टोमी: अगर पैंक्रियाज के निचले हिल्ले में कैंसरस ट्यूमर है तो पैंक्रियाज का निचला हिस्सा निकाल दिया जाता है।
- टोटल पैंक्रियाटेक्टोमी: अगर पूरे पैंक्रियाज में कैंसर फैल गया है तो पूरा पैंक्रियाज निकाला जा सकता है। हालांकि ऐसा रेयर मामले में होता है।
- कीमोथेरेपी: कैंसर सेल्स को मारने के लिए, कम करने के लिए और कंट्रोल करने के लिए यह थेरेपी दी जा सकती है।
- रेडिएशन थेरेपी: कैंसर बहुत बढ़ने पर कीमोथेरेपी के साथ रेडिएशन थेरेपी दी जा सकती है।
मारियानो बार्बासिड ने ह्यूमन कैंसर जीन पहचानने में मदद की थी
मारियानो बार्बासिड यूरोप के जाने-माने कैंसर वैज्ञानिक हैं। 1980 के दशक में उन्होंने पहले ह्यूमन कैंसर जीन की पहचान में मदद की थी, जिससे कैंसर रिसर्च की दिशा बदल गई। पिछले कई सालों से वह KRAS जीन से जुड़े कैंसर पर काम कर रहे हैं, जो पैंक्रियाटिक कैंसर के ज्यादातर मामलों में पाया जाता है।
यह रिसर्च स्पेन के नेशनल कैंसर रिसर्च सेंटर में की गई और इसे ‘फुंदासियोन क्रिस कॉन्ट्रा एल कैंसर’ का सपोर्ट था। इंस्टीट्यूट ने कहा कि ये रिसर्च सभी वैज्ञानिक नियमों के तहत की गई और पब्लिश होने से पहले इसकी पूरी जांच हुई थी।
अब अगला कदम सिक्टोरिटी टेस्टिंग पूरा करना है। इसके बाद मंजूरी मिलने पर इंसानों पर शुरुआती परीक्षण किए जाएंगे। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इंसानों में इसका इलाज आने में अभी समय लगेगा, लेकिन यह रिसर्च दिखाता है कि पैंक्रियाटिक कैंसर पर कई दवाओं के साथ इलाज करना ज्यादा असरदार हो सकता है।

मारियानो बार्बासिड कई साल से कैंसर रिसर्च पर काम कर रहे हैं। उन्होंने ह्यूमन कैंसर जीन की पहचान करने में मदद की थी।
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