नई दिल्ली52 मिनट पहले
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कांग्रेस ने शुक्रवार को आरोप लगाया कि पीएम मोदी ने ट्रम्प के दबाव पर ईरान के चाबहार पोर्ट से कंट्रोल छोड़ दिया है। पार्टी ने एक्स पर लिखा- मोदी सरकार ने चाबहार प्रोजेक्ट में देश की जनता के 120 मिलियन डॉलर (करीब 1100 करोड़ रुपए) लगाए थे। अब ये बर्बाद हो चुके हैं।
कांग्रेस के इस आरोप को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने खारिज किया। उन्होंने कहा कि ईरान के चाबहार पोर्ट से जुड़ी योजनाएं जारी हैं। इन्हें आगे बढ़ाने के लिए भारत, अमेरिका से बातचीत कर रहा है।
अमेरिका ने भारत को ईरान पर लगे प्रतिबंधों के बावजूद चाबहार पोर्ट से जुड़े काम जारी रखने के लिए एक खास सैंक्शन छूट दी है, जिसकी अवधि 26 अप्रैल 2026 को खत्म हो रही है।

भारत को अक्टूबर में 6 महीने की छूट दी गई थी
अमेरिकी सरकार ने पिछले साल 29 सितंबर को चाबहार पोर्ट के लिए 2018 में दी गई छूट वापस ले ली थी। यह छूट इसलिए दी गई थी ताकि ईरान पर प्रतिबंध होने के बावजूद भारत चाबहार पोर्ट पर काम कर सकें।
अमेरिका ने भारत को 27 अक्टूबर 2025 तक के लिए चाबहार से व्यापार करने की छूट दी थी। इसके खत्म होने से पहले ही एक बार फिर अमेरिका ने इसे 6 महीने के लिए बढ़ा दिया। यानी अब यह छूट 26 अप्रैल 2026 तक मिलती रहेगी।
रणधीर जायसवाल ने आज बताया कि 28 अक्टूबर 2025 को अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने भारत को एक पत्र भेजकर इस छूट से जुड़े दिशा-निर्देश दिए थे। उन्होंने कहा कि भारत अब इसी तय व्यवस्था के तहत अमेरिका से बातचीत कर रहा है, ताकि चाबहार पोर्ट से जुड़े काम बिना रुकावट आगे बढ़ते रहें।
ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाना चाहता है अमेरिका
- अमेरिका ने ईरान के चाबहार पोर्ट पर प्रतिबंध लगाए ताकि वह ईरान पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव बना सके।
- अमेरिका मानता है कि ईरान बंदरगाहों, तेल व्यापार और अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं से मिलने वाली कमाई का इस्तेमाल अपने परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल विकास में करता है।
- अमेरिका यह भी मानता है कि ईरान इस पैसे का इस्तेमाल पश्चिम एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए करता है।
- इसी कारण अमेरिका ईरान के सभी बड़े इनकम सोर्स को सीमित करना चाहता है, ताकि उस पर अपनी नीतियां बदलने का दबाव बनाया जा सके।
- 2018 में ईरान के परमाणु समझौते से बाहर निकलने के बाद अमेरिका ने ईरान के खिलाफ ‘मैक्सिमम प्रेशर’ नीति अपनाई और चाबहार पर प्रतिबंध इसी नीति का हिस्सा हैं।

चाबहार पोर्ट से भारत के 4 बड़े फायदे
1. बिना पाकिस्तान के रास्ते सेंट्रल एशिया तक पहुंच
- भारत को अफगानिस्तान या दूसरे एशियाई देशों तक सामान भेजने के लिए पाकिस्तान के रास्ते से नहीं जाना पड़ता।
- भारत ईरान के चाबहार पोर्ट से सीधा अपना माल अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया भेज सकता है। इससे समय और पैसा दोनों बचते।
2. व्यापार बढ़ेगा
- भारत चाबहार के जरिए अपने सामान, दवाएं, फूड और इंडस्ट्रीयल प्रोडक्ट आसानी से दूसरे देशों तक भेज सकता है।
- इससे भारत का एक्सपोर्ट बढ़ेगा और लॉजिस्टिक खर्च (ढुलाई खर्च) कम होगा।
- भारत को ईरान से तेल खरीदने में आसानी होती है। दोनों देश मिलकर चाबहार को एक ट्रेड हब बना सकेंगे।
3. भारत का निवेश सुरक्षित रहेगा
- भारत ने चाबहार पोर्ट के विकास में काफी पैसा और संसाधन लगाए हैं।
4. चीन-पाकिस्तान का काउंटर
- चाबहार बंदरगाह, पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट (जहां चीन निवेश कर रहा है) के नजदीक है।
- इसलिए यह पोर्ट भारत को रणनीतिक रूप से मजबूत बनाता है और चीन-पाकिस्तान गठजोड़ को काउंटर करने में मदद करता है।
भारत चाबहार से अफगानिस्तान को जरूरी सामान भेजता है
पहले भारत को अफगानिस्तान माल भेजने के लिए पाकिस्तान से गुजरना पड़ता था, लेकिन सीमा विवाद के कारण यह मुश्किल था। चाबहार ने यह रास्ता आसान बनाया। भारत इस बंदरगाह से अफगानिस्तान को गेहूं भेजता है और मध्य एशिया से गैस-तेल ला सकता है।
2018 में भारत और ईरान ने चाबहार विकसित करने का समझौता किया था। अमेरिका ने इस प्रोजेक्ट के लिए भारत को कुछ प्रतिबंधों में छूट दी थी। यह बंदरगाह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट, जिसे चीन बना रहा है, के मुकाबले भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
पोर्ट के लिए भारत ने अब तक क्या-क्या किया
- भारत ने साल 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान ईरान से चाबहार बंदरगाह को लेकर बातचीत शुरू की। बाद में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव के कारण यह प्रक्रिया रुक गई।
- साल 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चाबहार बंदरगाह में 800 करोड़ रुपए निवेश करने की घोषणा की।
- साल 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान और अफगानिस्तान के नेताओं के साथ चाबहार समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के तहत भारत ने एक टर्मिनल के लिए 700 करोड़ रुपए देने और बंदरगाह के विकास के लिए 1,250 करोड़ रुपए का कर्ज देने का फैसला किया।
- साल 2024 में तत्कालीन विदेश सचिव विनय क्वात्रा ने ईरान के विदेश मंत्री से मुलाकात कर कनेक्टिविटी के मुद्दे पर चर्चा की।
- भारतीय कंपनी इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) के अनुसार, चाबहार बंदरगाह पूरी तरह तैयार होने पर 82 मिलियन टन कार्गो संभाल सकेगा।

भारत और ईरान के बीच 2018 में इस पोर्ट को लेकर 18 महीने का छोटा समझौता हुआ था, जो बार-बार बढ़ाया जाता रहा।
ईरान से व्यापार पर 25% टैरिफ के सवाल पर भी जवाब दिया
अमेरिका ने 12 जनवरी को ईरान के साथ व्यापार करने पर 25% टैरिफ लगाने की घोषणा की। इसे लेकर पूछे गए सवाल पर जायसवाल ने कहा कि भारत इन घटनाक्रमों पर करीबी नजर रखे हुए है।
उन्होंने कहा कि पिछले वित्त वर्ष में भारत और ईरान के बीच कुल व्यापार करीब 1.6 अरब डॉलर (करीब ₹145.1 अरब) रहा। इसमें भारत का ईरान को निर्यात लगभग 1.2 अरब डॉलर (करीब ₹108.8 अरब) था, जबकि ईरान से आयात लगभग 0.4 अरब डॉलर (₹36.3 अरब) रहा। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के कुल वैश्विक व्यापार में ईरान की हिस्सेदारी बहुत कम है। करीब 0.15%।
भारत ने हिरासत में लिए भारतीयों के लिए कांसुलर एक्सेस मांगा
जायसवाल ने बताया कि ईरान में हिरासत में लिए गए 10 भारतीय नागरिकों के लिए भारत ने कांसुलर एक्सेस की मांग की है। इन 10 लोगों को इसलिए हिरासत में लिया गया था क्योंकि ईरान का कहना है कि जिस जहाज पर वे काम कर रहे थे, उस पर ईंधन की तस्करी हो रही थी।
उन्होंने ये भी बताया कि विदेश मंत्री जयशंकर ने ईरान जारी हिंसा को लेकर वहां विदेश मंत्री अब्बास अघारची से बात की है।
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