भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़े जनआंदोलन के बाद आम आदमी पार्टी की शुरुआत साल 2012 में शांति भूषण, प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव जैसी बड़ी शख्सियतों के साथ हुई थी. जैसे-जैसे पार्टी की जड़े फैलने लगीं पार्टी के भीतर के मतभेद और रणनीतिक निर्णय कुछ नेताओं को असहज करने लगे. राष्ट्रीय पार्टी बनने तक के सफर में इसने न केवल काफी उतार-चढ़ाव देखे, बल्कि कई बड़े चेहरों को निकलते भी देखा.
वर्तमान में अब इसी कड़ी में अगला नंबर राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा का जुड़ते हुए दिखाई दे रहा है. आज आपको बताएंगे कि AAP की स्थापना से लेकर अब तक किन बड़े चेहरों पार्टी का साथ छोड़ा है.
प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव
शांति भूषणआम आदमी पार्टी के प्रमुख संस्थापक सदस्यों में से एक थे और देश के वरिष्ठ वकीलों में गिने जाते थे. उन्होंने 2012 में पार्टी की स्थापना के समय 1 करोड़ रुपये का योगदान दिया था. हालांकि वैचारिक मतभेद और पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की कमी को लेकर असहमति के चलते उन्होंने 2015 में पार्टी से दूरी बना ली थी.
AAP के संस्थापक सदस्य रहे प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव ने अप्रैल 2015 में पार्टी का साथ छोड़ा था. साल 2015 में इन दोनों ने पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की कमी और अरविंद केजरीवाल के काम करने के तरीके पर सवाल उठाए थे. AAP ने सबसे पहले 4 मार्च 2015 को दोनों को पार्टी के राजनीतिक मामलों की समिति (PAC) और 28 मार्च 2015 को राष्ट्रीय कार्यकारी समिति के पदों से हटा दिया गया. 20 अप्रैल 2015 को AAP ने दोनों को अनुशासनहीनता के आधार पर बाहर का रास्ता दिखा दिया.
AAP की संस्थापक सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता शाजिया इल्मी ने 24 मई 2014 को पार्टी से इस्तीफा दे दिया था. उन्होंने पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की कमी और गुटबाजी का आरोप लगया था. उनका कहना था की पार्टी ने स्वराज के आदर्शों का मान नहीं रखा.
इसके बाद पत्रकार से नेता बने आशुतोष ने 15 अगस्त 2018 को AAP का साथ छोड़ा था. उन्होंने निजी कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफा दिया था.
कपिल मिश्रा और कुमार विश्वास
AAP के शुरुआती नेताओं में से एक कपिल मिश्रा का भी जल्द ही पार्टी की नीतियों से मोह भंग होने लगा. साल 2017 में AAP सरकार में मंत्री थे, लेकिन असहमति और पार्टी शीर्ष नेतृत्व से टकराव के कारण उन्हें मंत्री पद से हटा दिया गया था. इसके बाद वो अक्सर पार्टी को हर मुद्दे पर घेरते नजर आए. साल 2019 में मिश्रा बीजेपी में शामिल हो गए.
कुमार विश्वास ने भी साल 2018-2022 के बीच पार्टी का साथ छोड़ दिया था. हालांकि, उन्होंने कभी पार्टी से औपचारिक रूप से इस्तीफा नहीं दिया. उनका आरोप था कि राज्यसभा के लिए उम्मीदवारों का चयन पारदर्शी तरीके से नहीं किया गया केवल व्यक्तिगत पसंद के आधार पर प्राथमिकता दी गई. उन्होंने वैचारिक मतभेदों के कारण धीरे-धीरे पार्टी से दूरी बना ली.
इसके बाद अल्का लांबा ने और एचएस फुल्का ने भी AAP का साथ छोड़ दिया. इन नेताओं ने भी पार्टी नेतृत्व के साथ लंबे समय से चले मतभेद और असहमति के कारण पार्टी छोड़ी थी.
स्वाति मालीवाल बनाम AAP
इसके बाद साल 2024 में स्वाति मालीवाल और AAP का टकराव काफी चर्चा में रहा. उन्होंने कभी आधिकारिक तौर पर पार्टी नहीं छोड़ी. वास्तव में मालीवाल केजरीवाल की भरोसेमंद नेताओं में से एक मानी जाती थीं. हालांकि अब मालीवाल पार्टी की नीतियों के खिलाफ मुखर हैं. फिलहाल वह राज्यसभा सांसद हैं.
कैलाश गहलोत ने भी छोड़ दिया था साथ
वर्ष 2020 के चुनाव में आम आदमी पार्टी के टिकट पर नजफगढ़ से विधायक बने कैलाश गहलोत ने भी वर्ष 2024 के आम चुनावों के बाद पार्टी का दामन छोड़ दिया. वह बीजेपी में शामिल हो गए.
पार्टी के इतिहास को देखें तो अधिकतर नेताओं का पहले मतभेद हुआ फिर मोह भंग और फिर अलगाव. अब इस लिस्ट में राघव चड्ढा का नाम जुड़ते नजर आ रहा है. हाल ही में AAP चड्ढा को राज्यसभा में पार्टी के उप-नेता के पद से हटा दिया है. इसको लेकर सोशल मीडिया पर उन्होंने पार्टी के खिलाफ अपना मत रखा है.
शाजिया इल्मी ने AAP की शैली पर किया कटाक्ष
आप के हालिया घटनाक्रम पर बीजेपी नेता शाजिया इल्मी ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो के जरिए इसी क्रम पर प्रकाश डाला. उ्न्होंने AAP और चढ्ढा दोनों पर कटाक्ष किया. उन्होने कहा, ‘इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है. जैसी करनी वैसी भरनी. राघव चड्ढा यही कर रहे थे.पार्टी की वजह से अपने कद को बढ़ा रहे थे. तो जाहिर है, उन्हें उचित जगह पार्टी दिखाएगी. वैसे यह AAP की टेक्टबुक पॉलिटिक्स है. यह एक स्थापित पैटर्न है.उन्होंने सबके साथ वैसा ही किया.’
शाजिया ने आगे कहा, ‘राघव चड्ढा ने अपने मेंटर प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव का साथ देने की बजाय केजरीवाल का साथ दिया. प्रशांत भूषण व योगेंद्र यादव के खिलाफ बातें तक की, जिससे केजरीवाल खुश हो. आज वही चढ्ढा के साथ हो रहा है. अब इसमें कोई हैरानी नहीं है कि जो ‘चमचे’ की तरह रहता है, वही आगे बढ़ता है और वही लोग पार्टी में बने रहते हैं जिनका खुद का कोई अलग अस्तित्व नहीं था. राघव चड्ढा का कद बढ़ा है तो केजरीवाल तानाशाहि और असुरक्षित सोच के इंसान हैं तो ये बात तो उन्हें नागवार गुजरेगी.’
हालांकि, राघव चड्ढा ने अभी तक आधिकारिक रूप से पार्टी नहीं छोड़ी है और न ही पार्टी ने उन्हें निकाला है. वर्तमान में उन्हें महत्वपूर्ण पदों से हटाया जाना और बोलने पर पाबंदी लगाना तो इसी ओर इशारा करता है कि उनके और शीर्ष नेतृत्व के बीच सबकुछ ठीक नहीं है.


