ढाका4 घंटे पहले
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बांग्लादेश में 12 फरवरी को संसदीय चुनाव होने जा रहे हैं। पूर्व पीएम शेख हसीना के देश छोड़ने और खालिदा जिया के निधन के बाद यह पहला चुनाव है। 1991 से 2024 तक बांग्लादेश की राजनीति में इन दो नेताओं का दबदबा रहा।
ऐसे में 35 साल बाद देश को नया प्रधानमंत्री मिलेगा। शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को इस चुनाव में हिस्सा लेने की इजाजत नहीं दी गई है। चुनाव आयोग का कहना है कि 2024 में हुए छात्र आंदोलन के दौरान हुई हिंसा में पार्टी की भूमिका की वजह से यह फैसला लिया गया है।
अल जजीरा के मुताबिक एक्सपर्ट्स का कहना है कि बांग्लादेश के ये चुनाव सिर्फ देश की राजनीति ही नहीं, बल्कि पूरे साउथ एशिया की डिप्लोमेसी और पावर बैलेंस को बदल सकते हैं। इसलिए भारत, पाकिस्तान और चीन भी इन चुनाव पर नजर बनाए हुए हैं।

1991 से 2024 तक बांग्लादेश की राजनीति में शेख हसीना (दाएं) और खालिदा जिया (बाएं) का ही दबदबा रहा है। 35 साल बाद ये पहला चुनाव जिसमें दोनों मौजूद नहीं हैं।
हसीना के तख्तापलट के बाद विदेश नीति में बदलाव
बांग्लादेश में अगस्त 2024 से नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस की लीडरशिप में अंतरिम सरकार काम कर रही है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश की विदेश नीति में बड़ा बदलाव आया है।
भारत के साथ रिश्ते अब अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं, जबकि पाकिस्तान के साथ संबंध बेहतर हुए हैं और चीन के साथ रणनीतिक रिश्ते और मजबूत हुए हैं।
भारत-पाकिस्तान और चीन से बदलते बांग्लादेश के रिश्ते
भारत से तनाव बढ़ा
- बांग्लादेश में छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना को सत्ता छोड़नी पड़ी। वे भारत आ गईं, जिससे दोनों देशों में तनाव शुरू हुआ।
- बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले, मंदिर तोड़ने और हिंसा की खबरें आने लगीं, जिस पर भारत ने चिंता जताई।
- बांग्लादेशी सोशल मीडिया पर ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ के नक्शे और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को लेकर भड़काऊ बातें फैलीं।
- मोहम्मद यूनुस ने भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को लैंड-लॉक बताया, जिससे विवाद छिड़ा।
- भारत और बांग्लादेश की बॉर्डर पर BSF और BGB के बीच तनाव बढ़ा, तस्करी और बाड़ को लेकर बहस हुई।
- छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की गोली मारकर हत्या कर दी गई, जिसके बाद हिंसा फैली और भारत के खिलाफ माहौल बना।
पाकिस्तान से संबंध बेहतर
- दोनों देशों के बड़े नेताओं और अधिकारियों ने आपस में सीधे बात करना शुरू किया, जिससे पुराने तनाव धीरे-धीरे कम होने लगे।
- 2025 में कराची और चटगांव के बीच कॉर्गो जहाज फिर से चलने लगे, जिससे समुद्री व्यापार आसान हो गया।
- 2026 की शुरुआत में ढाका और कराची के बीच कई साल बाद सीधी फ्लाइट्स शुरू हुईं।
- पाकिस्तान और बांग्लादेश ने वीजा के नियम आसान करने पर बात की, खासकर सरकारी काम से आने-जाने वालों के लिए।
- अंतरराष्ट्रीय बैठकों में पाकिस्तान और बांग्लादेश कई मुद्दों पर एक-दूसरे के साथ खड़े नजर आए, जिससे तालमेल बढ़ा।
- SAARC जैसे क्षेत्रीय संगठनों को दोबारा सक्रिय करने के लिए दोनों देशों ने मिलकर काम करने की इच्छा जताई।
चीन से और करीबी बढ़ी
- 2025 में बांग्लादेश के नेताओं और चीन के राष्ट्रपति की मुलाकात हुई, जिसमें रिश्तों को और आगे बढ़ाने पर खुलकर बात हुई।
- दोनों देशों ने व्यापार बढ़ाने के लिए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट और निवेश से जुड़े समझौतों पर बातचीत शुरू करने का फैसला किया।
- चीन ने बांग्लादेश से आने वाले ज्यादातर सामान पर टैक्स नहीं लगाने की सुविधा आगे भी जारी रखने की बात कही।
- रक्षा के मामले में भी दोनों देश करीब आए और ड्रोन व दूसरी सैन्य तकनीक से जुड़े समझौते किए गए।
- जलवायु, खेती, तकनीक और डिजिटल विकास जैसे मुद्दों पर चीन और बांग्लादेश ने मिलकर काम करने की इच्छा जताई।
साउथ एशिया के पावर बैलेंस के लिए अहम बांग्लादेश
बांग्लादेश का आम चुनाव तय करेगा कि देश आगे भारत के करीब रहेगा या पाकिस्तान और चीन की तरफ झुकेगा। इससे साउथ एशिया का पावर बैलेंस बदल सकता है। इसी वजह से इस चुनाव को बेहद अहम माना जा रहा है।
बांग्लादेश साउथ एशिया के पावर बैलेंस के लिए इसलिए अहम है क्योंकि यह देश भूगोल, राजनीति, अर्थव्यवस्था और रणनीतिक हितों चारों मोर्चों पर एक साथ असर डालता है।
बांग्लादेश, भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को लगभग चारों तरफ से घेरता है। भारत का नॉर्थ-ईस्ट सिलीगुड़ी कॉरिडोर के जरिए भारत से कनेक्ट होता है। ऐसे में बांग्लादेश की भूमिका भारत के लिए कनेक्टिविटी, सुरक्षा और सप्लाई लाइनों के लिहाज से बेहद संवेदनशील हो जाती है।
दूसरी बड़ी वजह है भारत-चीन की रणनीतिक खींचतान। चीन पिछले कुछ सालों में बांग्लादेश में बंदरगाह, सड़क, बिजली और इन्फ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश कर चुका है। बांग्लादेश अगर चीन के ज्यादा करीब जाता है तो यह भारत के लिए सीधा रणनीतिक झटका होता है, खासकर बंगाल की खाड़ी और इंडियन ओशन रीजन में।
बांग्लादेश की समुद्री सीमा इस इलाके को रणनीतिक रूप से बहुत अहम बना देती है। यह इलाका ग्लोबल शिपिंग, एनर्जी रूट्स और नौसैनिक गतिविधियों के लिए बेहद संवेदनशील है।
चौथा फैक्टर है इस्लामिक राजनीति और कट्टरपंथ। बांग्लादेश मुस्लिम बहुल देश है, लेकिन अब तक उसकी राजनीति तुलनात्मक रूप से संतुलित रही है। अगर वहां राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है या कट्टरपंथ को जगह मिलती है, तो इसका असर सिर्फ बांग्लादेश तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भारत, म्यांमार और पूरे साउथ एशिया की सुरक्षा पर पड़ता है।

भारत और चीन-पाकिस्तान तीनों की बांग्लादेश चुनाव पर नजर
अगर इस चुनाव में BNP जीतती है या मजबूत सरकार बनाती है, तो भारत-बांग्लादेश रिश्तों में दूरी बढ़ सकती है। सीमा सुरक्षा और आपसी भरोसे पर असर पड़ेगा, जबकि पाकिस्तान को रिश्ते सुधारने का मौका मिलेगा। चीन भी निवेश और बड़े प्रोजेक्ट्स के जरिए बांग्लादेश में अपनी पकड़ मजबूत कर सकता है।
अगर नतीजा साफ नहीं रहा और गठबंधन सरकार बनी, तो हालात और अस्थिर होंगे, जिससे भारत की स्थिति कमजोर और पाकिस्तान-चीन की भूमिका मजबूत हो सकती है।
वहीं अगर जमात-ए-इस्लामी सत्ता में आती है या सरकार में बड़ी भूमिका निभाती है, तो भारत की चिंता सबसे ज्यादा बढ़ेगी। सुरक्षा और कट्टरपंथ को लेकर दबाव बढ़ सकता है, जबकि पाकिस्तान को वैचारिक और राजनीतिक फायदा मिलेगा।
चीन के लिए यह स्थिरता और निवेश बढ़ाने का मौका होगा। कुल मिलाकर, 12 फरवरी का चुनाव यह तय करेगा कि बांग्लादेश किस खेमे में जाएगा।
भारत-बांग्लादेश ने एक दूसरे के एक्सपोर्ट पर बैन लगाया
हसीना के 15 साल के शासन के दौरान भारत और बांग्लादेश के बीच रिश्ते काफी करीबी थे। भारत बांग्लादेश का एक अहम रणनीतिक और व्यापारिक साझेदार रहा है। लेकिन हसीना के भारत आने के बाद दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा और एक-दूसरे के निर्यात पर पाबंदियां भी लगाई गईं।
2024-25 में भारत और बांग्लादेश के बीच कुल व्यापार लगभग 13.51 अरब डॉलर रहा, जिसमें भारत ने 11.46 अरब डॉलर का एक्सपोर्ट किया और लगभग 2.05 अरब डॉलर का समान इंपोर्ट किया। हालांकि, एक्सपर्ट्स को आशंका है कि आने वाले वक्त में प्रतिबंधों की वजह से दोनों देशों का व्यापार घट सकता है।
बांग्लादेश की आजादी के बाद से भारत-बांग्लादेश संबंध इस बात पर निर्भर करते रहे हैं कि ढाका में कौन सी पार्टी सत्ता में है। हसीना के कार्यकाल में रिश्ते मजबूत रहे, लेकिन विपक्षी दल अक्सर उन पर भारत के सामने कमजोर रुख अपनाने का आरोप लगाते रहे।

दोनों देशों में क्रिकेट खेलने पर विवाद छिड़ा
हसीना के हटने के बाद बांग्लादेश में भारत विरोधी भावनाएं भी बढ़ीं। हालात उस समय और बिगड़े जब छात्र आंदोलन के नेता उस्मान हादी की हत्या हुई, जिसके बाद भारत के खिलाफ प्रदर्शन हुए।
भारत ने अंतरिम सरकार के दौरान बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के साथ दुर्व्यवहार का आरोप भी लगाया। दिसंबर में एक हिंदू युवक की हत्या का मामला भी सामने आया था।
इन तनावों के बीच भारत और बांग्लादेश की क्रिकेट को लेकर भी विवाद हुआ। बांग्लादेश ने भारत में होने वाले टी20 वर्ल्ड कप मैचों को किसी और देश में कराने की मांग की, लेकिन ICC ने बांग्लादेश को टूर्नामेंट से बाहर कर दिया। इसके बाद पाकिस्तान ने बांग्लादेश के समर्थन में भारत के खिलाफ मैच खेलने से इनकार कर दिया।
भारत चाहता है कि चुनाव के बाद बांग्लादेश में ऐसी सरकार बने जो भारत के साथ रिश्ते सुधार सके। जानकारों का कहना है कि भारत BNP की सरकार के साथ काम करने को तैयार हो सकता है, लेकिन जमात की जीत को लेकर उसकी चिंता ज्यादा है। इसी वजह से भारत दोनों पार्टियों से संपर्क बनाए हुए है।
पाकिस्तान 1971 के विवादों को पीछे छोड़ना चाहता है
वहीं, पाकिस्तान हसीना के हटने के बाद बांग्लादेश के और करीब आया है। 2024 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मोहम्मद यूनुस से दो बार मुलाकात की। दोनों देशों के बीच व्यापार दोबारा शुरू हुआ और 14 साल बाद सीधी उड़ान सेवाएं भी बहाल की गईं। सैन्य और रक्षा स्तर पर बातचीत भी हुई है।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान बांग्लादेश के साथ रिश्ते मजबूत कर भारत पर रणनीतिक दबाव बनाना चाहता है और 1971 के युद्ध से जुड़े पुराने मुद्दों को पीछे छोड़ने की कोशिश कर रहा है।
चीन अलग-अलग बांग्लादेशी पार्टियों के संपर्क में
चीन भी बांग्लादेश में अपनी मौजूदगी लगातार बढ़ा रहा है। हसीना के समय भी दोनों देशों के बीच आर्थिक समझौते हुए थे और यूनुस की अंतरिम सरकार के दौरान भी चीन ने 2.1 अरब डॉलर के निवेश और कर्ज की घोषणा की है। चीन ने बांग्लादेश में बुनियादी ढांचे और रक्षा सहयोग को बढ़ाने में रुचि दिखाई है।
चीन के नेता अलग-अलग राजनीतिक दलों से संपर्क में हैं और उनका मानना है कि चुनाव के बाद जो भी सरकार बने, उसके साथ काम किया जाएगा। चीन के लिए बांग्लादेश में राजनीतिक स्थिरता और उसके निवेश की सुरक्षा सबसे अहम है।



