भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुए ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर अमेरिका का रिएक्शन सामने आया है. चूंकि भारत-अमेरिका के बीच ट्रेड डील को लेकर अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है, जिस वजह से ट्रंप प्रशासन का बयान कई मायनों में अहम माना जा रहा है. अमेरिकी ट्रेड अधिकारी और ट्रंप के करीबी जैमीसन ग्रीर ने कहा कि EU के साथ डील में सबसे बड़ा फायदा भारत का होने वाला है.
EU के साथ डील में टॉप पर भारत: जैमीसन ग्रीर
अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जैमीसन ग्रीर ने कहा, ‘मैंने अब तक इस डील के कुछ डिटेल्स देखे हैं. ईमानदारी से कहूं तो इसमें भारत को फायदा मिलता दिख रहा है. भारत को यूरोप के बाजार में ज्यादा पहुंच मिल रही है. कुल मिलाकर भारत टॉप पर रहेगा. ऐसा भी हो सकता है कि इस डील में कुछ इमिग्रेशन राइट्स भी दे दिए जाएं, जिससे भारतीय प्रोफेशनल्स और वर्कर्स को यूरोपीय देशों में काम करने के ज्यादा मौका मिल जाए.’ उन्होंने ये भी कहा कि अमेरिका की बदलती ट्रेड पॉलिसी की वजह से भारत-EU के बीच फ्री ट्रेड डील हुआ है.
‘अमेरिका के कारण यूरोपी खोज रहा दूसरा मार्केट’
अमेरिकी न्यूज चैनल फॉक्स बिजनेस को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, ‘यह समझना जरूरी है कि जब अमेरिका अपने बाजार को सीमित कर रहा है तब यूरोपीय यूनियन जैसे ट्रेड-डिपेंडेंट ब्लॉक को दूसरा ऑप्शन खोजने पड़ रहे हैं. यही कारण है कि यूरोपीय यूनियन भारत जैसे बड़े बाजार की ओर रुख कर रहा है.’
ग्रीर ने यूरोपीय संघ की आलोचना करते हुए कहा कि जब अमेरिका वैश्वीकरण की कुछ समस्याओं को ठीक करने की कोशिश कर रहा है, तब नाटो वैश्वीकरण पर और जोर दे रहा है. उन्होंने कहा, ‘यह समझना जरूरी है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने घरेलू उत्पादन को प्राथमिकता देते हुए अन्य देशों से हमारे बाजार में आने वाले सामानों पर टैरिफ लगाना शुरू किया. यही कारण है कि ये देश अपने सामान के लिए अन्य बाजार तलाश रहे हैं. यूरोपीय यूनियन ट्रेड पर इतना निर्भर है कि उसे अन्य बाजारों की जरूरत है इसलिए वह अपना सारा सामान अमेरिका को नहीं भेज सकता.’
‘रूसी तेल को लेकर यूरोप ने भारत पर नहीं बनाया दवाब’
जैमीसन ग्रीर के बयान की टाइमिंग बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ दिन पहले की अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने रूसी तेल को लेकर भारत पर दवाब नहीं डालने के लिए यूरोपीय यूनियन पर निशाना साधा था. उन्होंने कहा, अमेरिकी टैरिफ के कारण ही भारत ने रूसी तेल की खरीद कम की क्योंकि यूरोपीय देश ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. वे (EU) भारत के साथ एक बड़ा ट्रेड डील करना चाहते थे.


