Monday, January 26, 2026
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चीन ने जापान से वापस मांगे अपने जुड़वा पांडा:आज आखिरी बार देखने पहुंचे हजारों लोग; 50 साल बाद बिना पांडा के रह जाएगा जापान




जापान के पांडा प्रेमियों के लिए यह हफ्ता भावुक करने वाला है। टोक्यो के उएनो चिड़ियाघर में मौजूद आखिरी दो जुड़वां पांडा शाओ शाओ और लेई लेई 27 जनवरी को चीन लौट रहे हैं। इन पांडा पर चीन का मालिकाना हक है। रविवार को चिड़ियाघर में इन्हें आखिरी बार सार्वजनिक तौर पर दिखाया गया। हजारों लोग आखिरी बार पांडा देखने पहुंचे। चिड़ियाघर ने हर विजिटर को सिर्फ एक मिनट का समय दिया था। इसके बावजूद लोग पांडा-थीम वाले खिलौनों के साथ पहुंचे, उनके नाम पुकारते रहे और मोबाइल से फोटो-वीडियो बनाते दिखे। कई लोग टिकट न मिलने के बावजूद चिड़ियाघर आए, ताकि इस विदाई के गवाह बन सकें। इनके जाने के बाद जापान पहली बार पिछले करीब 50 साल में बिना पांडा रह जाएगा। इनकी विदाई के पीछे जापान और चीन के बीच बिगड़ते रिश्ते बड़ी वजह माने जा रहे हैं। चीन-जापान रिश्तों में क्यों बढ़ी तल्खी हाल के महीनों में टोक्यो और बीजिंग के रिश्तों में तनाव बढ़ा है। जापानी प्रधानमंत्री साने ताकाइची के उस बयान से चीन नाराज है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ताइवान पर चीन की किसी भी कार्रवाई से जापान दखल दे सकता है। टोक्यो महानगर सरकार की ओर से नए पांडा भेजने के अनुरोध के बावजूद चीन ने साफ कर दिया है कि फिलहाल उएनो चिड़ियाघर में पांडा भेजने की कोई योजना नहीं है। चीन के सरकारी अखबार बीजिंग डेली ने एक विशेषज्ञ के हवाले से कहा कि अगर तनाव बना रहा तो जापान में भविष्य में पांडा दिखाई ही नहीं देंगे। जापान में पांडा डिप्लोमेसी पहले भी राजनीति से टकरा चुकी है। 2011 के भूकंप और सुनामी के बाद सेंदाई शहर में पांडा लाने की योजना 2012 के क्षेत्रीय विवाद के बाद रद्द कर दी गई थी। शाओ शाओ और लेई लेई का जन्म 2021 में उएनो चिड़ियाघर में हुआ था। चीन पांडा दूसरे देशों को उधार देता है, लेकिन उनका मालिकाना हक अपने पास रखता है, यहां तक कि विदेश में जन्मे बच्चों पर भी। चीन ने जापान को पहली बार 1972 में भेजे थे पांडा चीन ने 1972 में पहली बार जापान को पांडा भेजे थे। यह तोहफा दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध सामान्य होने का प्रतीक था। काले-सफेद पांडा जल्द ही जापान में बेहद लोकप्रिय हो गए और बाद के दशकों में आए पांडा राष्ट्रीय सितारों जैसे माने जाने लगे। पांडा लंबे समय से चीन की कूटनीति का हिस्सा रहे हैं। 1970 के दशक में चीन ने अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों को भी पांडा तोहफे में दिए थे। 1980 के दशक के बाद चीन ने गिफ्ट की जगह लीज सिस्टम शुरू किया, जिसके तहत विदेशी चिड़ियाघर संरक्षण और रिसर्च के लिए शुल्क देते हैं। पांडा नहीं तो जापान को सैकड़ों करोड़ का नुकसान पांडा जापान में सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि आर्थिक संपत्ति भी हैं। उएनो इलाके में पांडा से जुड़ा कारोबार बड़े पैमाने पर चलता है। दुकानों, स्टेशन और डिपार्टमेंट स्टोर्स में पांडा थीम वाले सामान बिकते हैं। कंसाई यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एमेरिटस कात्सुहिरो मियामोतो के मुताबिक, अगर उएनो जू में पांडा नहीं रहे तो जापान को सालाना कम से कम ₹8500 करोड़ का आर्थिक नुकसान हो सकता है। उन्होंने कहा कि इसका असर सिर्फ जू तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि होटल, रेस्टोरेंट, कैफे और स्मारिका दुकानों तक पहुंचेगा। अगर यह स्थिति कई साल तक बनी रही, तो कुल नुकसान 20 हजार से 50 हजार करोड़ तक पहुंच सकता है। इसका उदाहरण 2008 में देखने को मिला था। उस साल पांडा लिंग लिंग की मौत के बाद उएनो जू एक साल तक पांडा-विहीन रहा। उसी वित्तीय वर्ष में जू में आने वाले विजिटर्स की संख्या 60 साल में पहली बार 30 लाख से नीचे गिर गई थी।



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