भारत अपनी रक्षा ताकत को मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है. देश के डिफेंस सिस्टम को आधुनिक बनाने में हजारों-लाखों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं. करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये की लागत से 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की योजना इसका ताज़ा उदाहरण है. इसके अलावा एयर डिफेंस सिस्टम को मजबूत करने पर भी भारी रकम लगाई जा रही है.
मिशन सुदर्शन चक्र के तहत पूरे देश के लिए एक ऐसी वायु सुरक्षा प्रणाली तैयार की जा रही है, जो 2035 तक भारत के हर हिस्से को हवाई हमलों से सुरक्षित बना सके. इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए केंद्र सरकार ने भारतीय वायु सेना की ताकत बढ़ाने के लिए एक और बड़ा और अहम फैसला लिया है.
6 नए मल्टीरोल टैंकर ट्रांसपोर्ट विमान खरीद को मंजूरी
एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग क्षमता को मजबूत करने के लिए भारत सरकार ने छह मल्टीरोल टैंकर ट्रांसपोर्ट (MRTT) विमानों की खरीद को हरी झंडी दे दी है. इस सौदे की कुल अनुमानित लागत 1.1 अरब अमेरिकी डॉलर यानी लगभग 9,978 करोड़ रुपये है. इन टैंकर विमानों की मदद से लंबी दूरी के मिशन पर तैनात लड़ाकू विमान बिना लैंड किए हवा में ही ईंधन भर सकेंगे. इससे फाइटर जेट्स को विस्तारित मिशनों के दौरान ईंधन की कमी जैसी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ेगा. अमेरिका और रूस जैसे देशों के पास इस क्षेत्र में पहले से ही मजबूत क्षमता है और अब भारत भी इस क्लब में मजबूती से शामिल होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है.
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक पहुंच होगी मजबूत
यह सौदा न केवल भारतीय वायु सेना की परिचालन क्षमता को बढ़ाएगा, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक पहुंच और प्रभाव को भी व्यापक बनाएगा. इस कार्यक्रम का नेतृत्व इज़राइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (IAI) कर रही है, जबकि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) की इसमें अहम भागीदारी होगी.
पुराने Il-78 टैंकर अब अंतिम चरण में
वर्तमान में भारतीय वायु सेना के पास मुख्य रूप से रूसी मूल के Il-78MKI एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग टैंकर विमान हैं, जिन्हें वर्ष 2003 में शामिल किया गया था. ये विमान अब औसतन 22 वर्षों से अधिक समय से सेवा में हैं और अपनी प्रभावी परिचालन आयु के अंतिम चरण में पहुंच चुके हैं.
रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, बढ़ती मेंटेनेंस लागत, सीमित उपलब्धता और आधुनिक लड़ाकू विमानों के साथ तकनीकी एकीकरण की कमी के कारण इन विमानों का ऑपरेशनल प्रभाव घट रहा है. ग्लोबलडाटा के फ्लीट विश्लेषण में भी Il-78 विमानों की विश्वसनीयता में लगातार गिरावट दर्ज की गई है, जिससे राफेल, Su-30MKI और तेजस जैसे अग्रिम पंक्ति के लड़ाकू विमानों के लंबे अभियानों को समर्थन देना कठिन होता जा रहा है. ऐसे में MRTT विमानों की खरीद को एक आवश्यक और समयोचित सुधार माना जा रहा है.
MRTT की तकनीकी विशेषताएं
प्रत्येक MRTT विमान में दो जनरल इलेक्ट्रिक CF6-80C2 या समकक्ष टर्बोफैन इंजन लगाए जाएंगे, जो करीब 60,200 पाउंड यानी लगभग 268 किलो न्यूटन का थ्रस्ट प्रदान करेंगे. इन विमानों का अधिकतम टेक-ऑफ वजन लगभग 1,86,000 किलोग्राम होगा.
ये विमान 72,500 से 90,700 किलोग्राम तक ईंधन ट्रांसफर करने में सक्षम होंगे. अधिकतम मैक 0.80 (करीब 851 किमी प्रति घंटा) की गति और 11,000 किलोमीटर से अधिक की फेरी रेंज के साथ ये मौजूदा Il-78 विमानों की तुलना में कहीं अधिक सक्षम होंगे. अंडरविंग पॉड्स के जरिए ये प्रोब-एंड-ड्रोग और बूम दोनों तरह की रिफ्यूलिंग सपोर्ट देने में सक्षम होंगे.
HAL पर होगी बड़ी जिम्मेदारी
चुना गया MRTT विमान बोइंग 767 यात्री विमान का बदला हुआ रूप होगा, जिसे सेना की जरूरतों के हिसाब से तैयार किया जा रहा है. ‘इंडियन डिफेंस न्यूज़’ के मुताबिक, इस विमान में ज्यादा ईंधन ले जाने की क्षमता होगी, लंबी दूरी तक उड़ने की ताकत होगी और इसमें आधुनिक प्रोब-एंड-ड्रोग रिफ्यूलिंग सिस्टम लगा होगा, जिससे यह भारतीय वायु सेना के ज्यादातर लड़ाकू विमानों के साथ आसानी से काम कर सकेगा.
इस सौदे में HAL की मौजूदगी इसे और भी अहम बना देती है. HAL न सिर्फ इन विमानों में भारतीय सिस्टम लगाने में मदद करेगा, बल्कि देश के अंदर ही इनके रखरखाव, मरम्मत और ओवरहॉल की व्यवस्था भी विकसित करेगा. इससे बाहर से स्पेयर पार्ट्स मंगाने पर निर्भरता कम होगी और विमान ज्यादा समय तक ऑपरेशन के लिए उपलब्ध रहेंगे. यह पूरी पहल सरकार के ‘आत्मनिर्भर भारत’ मिशन से जुड़ी है और जानकारों का मानना है कि HAL और IAI की साझेदारी से तकनीक मिलने और आगे चलकर निर्यात के नए रास्ते भी खुल सकते हैं.
लंबी दूरी के अभियानों में मिलेगा निर्णायक लाभ
एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग विमान किसी भी आधुनिक वायु सेना के लिए फोर्स मल्टीप्लायर माने जाते हैं. ये विमानों को बिना फॉरवर्ड बेस पर उतरे लंबी दूरी तक मिशन पूरा करने में सक्षम बनाते हैं. विशाल भौगोलिक क्षेत्र और विस्तृत समुद्री सीमाओं वाले भारत के लिए यह क्षमता अत्यंत महत्वपूर्ण है.
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, चीन की बढ़ती हवाई और समुद्री गतिविधियों तथा पाकिस्तान के साथ संभावित तनावों के बीच भारतीय वायु सेना को अपनी ऑपरेशनल पहुंच बढ़ाने की जरूरत महसूस हो रही थी. MRTT विमानों की तैनाती से हिंद महासागर क्षेत्र में सतत निगरानी, त्वरित प्रतिक्रिया और दूरस्थ अभियानों में भारत को बढ़त मिलेगी.
चीन को जवाब देने की तैयारी
पिछले वर्ष ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान सीमा पार अभियानों में एयरफोर्स को ईंधन आपूर्ति से जुड़ी सीमाओं का सामना करना पड़ा था. रक्षा सूत्रों के अनुसार, इसी अनुभव ने नीति-निर्माताओं को एयर रिफ्यूलिंग क्षमता को प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित किया.
MRTT विमानों के शामिल होने से राफेल जैसे अत्याधुनिक फाइटर जेट लंबी दूरी की सटीक हथियार प्रणालियों के साथ अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकेंगे. Su-30MKI को लंबे समय तक हवा में गश्त करने की क्षमता मिलेगी, जबकि तेजस जैसे हल्के लड़ाकू विमानों की सामरिक लचीलापन भी बढ़ेगा. यह सौदा चीन के साथ LAC पर जारी तनाव और पाकिस्तान के साथ संभावित संघर्ष परिदृश्यों में भारत की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करेगा. हिंद महासागर क्षेत्र में यह कदम भारत को शक्ति संतुलन में अग्रणी भूमिका निभाने में मदद करेगा.
चीन की बढ़ती ताकत को जवाब
जानकारों का कहना है कि यह सौदा क्वाड जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों के जरिए इलाके में स्थिरता बनाए रखने की भारत की रणनीति के बिल्कुल अनुरूप है. चीन जिस तेजी से अपने H-6U टैंकर विमानों की संख्या बढ़ा रहा है, उसके मुकाबले भारतीय वायु सेना में MRTT विमानों की तैनाती एक मजबूत संतुलन बनाएगी.
नए विमानों के आने के साथ पायलटों और ग्राउंड स्टाफ की ट्रेनिंग में भी बदलाव किया जाएगा. IAI के साथ सिम्युलेटर समझौतों के जरिए क्रू को हवा में ईंधन भरने की आधुनिक तकनीक, एक साथ कई विमानों को रिफ्यूल करने और नेटवर्क आधारित युद्ध प्रणाली की ट्रेनिंग दी जाएगी.
स्क्वाड्रन की कमी में राहत
इस समय भारतीय वायु सेना को स्क्वाड्रन की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है. जहां 30 स्क्वाड्रन होने चाहिए, वहां फिलहाल सिर्फ 18 ही सक्रिय हैं. MRTT विमानों के शामिल होने से मौजूदा लड़ाकू विमान ज्यादा देर तक और ज्यादा असरदार तरीके से मिशन कर पाएंगे. इससे कम संसाधनों में भी ज्यादा काम लिया जा सकेगा और AMCA जैसे भविष्य के फाइटर प्रोजेक्ट्स के लिए जरूरी समय भी मिल जाएगा.
पैसों के लिहाज से भी यह डील समझदारी भरी मानी जा रही है. छह विमानों के लिए 1.1 अरब डॉलर की कीमत यूरोप के A330 MRTT जैसे महंगे प्लेटफॉर्म के मुकाबले कम है. यह सौदा सरकार से सरकार के स्तर पर हुआ है, जिससे लंबी टेंडर प्रक्रिया से बचते हुए जल्दी फैसला लिया जा सका.
वायु सेना को मिलेगा बड़ा फायदा
छह MRTT विमानों की यह खरीद सिर्फ पुराने विमानों की जगह नए लाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय वायु सेना के लिए एक बड़ा रणनीतिक कदम है. इससे न सिर्फ ऑपरेशनल ताकत और मिशन की क्षमता बढ़ेगी, बल्कि आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन, क्षेत्रीय संतुलन और देश की लंबी अवधि की सुरक्षा जरूरतों को भी मजबूती मिलेगी. बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय हालात में यह फैसला भारत की वायु शक्ति को नई दिशा देने वाला एक अहम और दूरगामी कदम साबित हो सकता है.


