Delhi-NCR Air Pollution: साल बदला, वक्त बदला, लेकिन दिल्ली-एनसीआर की जहरीली हवाएं नहीं बदलीं. एक तो कड़ाके की सर्दी, घना कोहरा, ऊपर से प्रदूषण के चलते दिल्ली-एनसीआर में रहने वालों की सेहत लगातार बिगड़ रही है. कई कोशिशें की जा रही हैं, लेकिन कुछ ठोस निकलकर सामने नहीं आ रहा है.
प्रदूषण को रोकने या इन्हें कम करने की कोशिशों में जनरेटर के इस्तेमाल पर रोक लगाई गई है, खुले में अलाव जलाने पर रोक लगी हुई है और शहरों में पेट्रोल व डीजल से चलने वाली बसों की एंट्री भी रोकी गई है. इनके अलावा, दिल्ली-एनसीआर में BS-3 पेट्रोल और BS-4 डीजल कारों को सड़कों पर चलने की अनुमति भी नहीं दी जा रही है.
क्या है BS-3, 4 और 6 कैटेगरी?
BS-3 की कैटेगरी में 2010 से पहले बने मॉडल शामिल हैं, जो प्रदूषण के पुराने मानकों पर बेस्ड हैं और ज्यादा धुआं छोड़ती हैं. Hyundai Santro, Indigo, Tata Indica जैसी गाड़ियां BS-3 कैटेगरी के तहत आते हैं. इसका मतलब है कि ये BS-4 या BS-6 कैटेगरी के तहत आने वाली गाड़ियों के मुकाबले नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) और पार्टिकुलेट मैटर (PM) जैसे प्रदूषक ज्यादा फैलाते हैं.
इसी तरह से BS-4 1 अप्रैल 2017 से 31 मार्च 2020 के बीच बनी गाड़ियां हैं. Toyaota Inova से लेकर Mahindra Scorpio जैसे मॉडल इसी कैटेगरी में आते हैं. ऐसे में इनके चलाने पर भी पाबंदी लगी हुई है. मौजूदा समय में BS-6 मानक लागू हैं. यानी कि BS-4 के बाद आने वाले ऐसे मॉडल जो प्रदूषण को कम करते हैं. इनसे हवा साफ रहती है और उसे नुकसान नहीं पहुंचता है.
मुश्किल में आम आदमी
अब सवाल यह आता है कि हर 5-10 सालों में गाड़ियां पुरानी हो जाएंगी, तो आम आदमी का गुजारा कैसे होगा, जो अमूमन EMI पर गाड़ियां खरीदते हैं, जो खत्म हो नहीं रही कि फिर से एक नया फरमान आ जा रहा है और उन्हें मजबूरी में अपनी गाड़ी बेचकर नई कारें लेनी पड़ रही हैं. इसके अलावा, उनके पास कोई चारा भी नहीं है क्योंकि दिल्ली-एनसीआर जैसे शहरों में मेट्रो की कनेक्टिविटी के अलावा और कोई खास साधन उपलब्ध नहीं है. हर रोज कैब के भरोसे रहना भी अक्लमंदी नहीं है. ऐसे में लोग ज्यादातर कुछ अमाउंट डाउन पेमेंट कर नई कारें खरीद रहे हैं, लेकिन अगर 30-40 साल चलने वाली गाड़ी 5-10 साल में ही पुरानी घोषित कर दी जाए, तो लोग कहां जाए.
पुरानी गाड़ियों पर पाबंदी क्यों?
इस पर IIMC में प्रोफेसर और मार्केट के जानकार शिवाजी सरकार से हुई एबीपी लाइव की बातचीत में कई बातें निकलकर सामने आईं. उन्होंने बताया, ”विदेशों में 40-40 साल पुरानी गाड़ियां चलती हैं, लेकिन हमारे यहां प्रदूषण बढ़ने के नाम पर नहीं बिकने दिया जाता है. जबकि गाड़ियों से निकलने वाला धुआं 1 परसेंट से भी कम होता है, ऐसे में इनसे प्रदूषण बढ़ने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता. ऐसे में कई बार गाड़ियों के बिकने की स्थिति में कंपनियां उन्हें खरीदकर उनके पार्ट्स (हेडलाइट्स, विंडशील्ड वगैरह ) को रीसाइकिल कर वापस से नई गाड़ियों में इस्तेमाल कर रही हैं.”
उन्होंने हाल ही में टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि दिल्ली साल 2020 के बाद से सबसे साफ शहरों में से एक रही है, ऐसे में प्रदूषण क्यों और कैसे फैल रहा है यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है.
शिवाजी सरकार आगे कहते हैं, ”दिल्ली में पिछले एक साल में 8,20,000 गाड़ियां बिकी हैं. ऐसे में पुराने पार्ट्स के इस्तेमाल और नई गाड़ियों की बिक्री से कंपनियों को 30-90 परसेंट ज्यादा मुनाफा हो रहा है. जबकि इससे आम आदमी को नुकसान पहुंच रहा है. अमूमन 70-80 परसेंट लोग लोन लेकर गाड़ियां खरीद रहे हैं, जिन्हें चुकाने में कम से कम सात-आठ साल लग जाते हैं. इतने में गाड़ियां दो-तीन साल बाद फिर पुरानी हो जाएंगी और उन्हें चलाने से रोक दिया जाएगा, यह एक खेल है, जिसे खेलने से रोका जाना चाहिए.”
पब्लिक ट्रांसपोर्ट हो और बेहतर
वह आगे कहते हैं, ”इसके लिए दिल्ली-एनसीआर में ट्रांसपोर्ट सिस्टम पर और ज्यादा काम होना चाहिए. मेट्रो कनेक्टिविटी के साथ बसें अच्छी होनी चाहिए. यह ध्यान रखना चाहिए कि ये ज्यादा से ज्यादा रूट्स कवर करें क्योंकि दिल्ली, गुड़गांव, फरीदाबाद के अलावा और भी जिले हैं, जो एनसीआर के क्षेत्र में आते हैं. ऐसे में इन तक भी पहुंच बेहतर करनी चाहिए ताकि लोग पर्सनल व्हीकल के भरोसे नहीं, बल्कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करें. दिल्ली में प्रदूषण के नाम पर गाड़ियों के साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार बिल्कुल अनुचित है और इस पर सरकार को तुरंत एक्शन लेने की जरूरत है.”
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