पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 23 जून, 2026 को एक प्रेस रिलीज के जरिए ‘इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल प्रोग्राम’ के बारे में गलत जानकारी को दूर करने और तथ्यों पर आधारित स्पष्टीकरण देने के लिए पहले ही एक विस्तृत स्पष्टीकरण जारी कर दिया था। ऑटोमोबाइल कंपनियों ने भी 4 जुलाई, 2026 को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस प्रोग्राम के बारे में स्पष्टीकरण जारी किए थे।
इन स्पष्टीकरणों के बावजूद, ‘इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल प्रोग्राम’ को लेकर कुछ चिंताएं जताई जा रही हैं। ऐसे में सरकार के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 20 प्रतिशत इथेनॉल मिक्स वाले E20 पेट्रोल को लेकर ‘अक्सर पूछे जाने वाले सवालों’ (FAQs) के तथ्यों और सबूतों पर आधारित जवाब दिए हैं।
प्रश्न 1: ब्राजील जैसे देशों को इथेनॉल वाले पेट्रोल की बिक्री शुरू करने में दशकों लग गए, तो भारत ने अपने इथेनॉल ब्लेंडिंग लक्ष्यों को पूरा करने में इतनी जल्दबाजी क्यों की?
- सबसे पहले ये समझना जरूरी है कि इथेनॉल कोई नया फ्यूल नहीं है। इथेनॉल का आविष्कार हमने नहीं किया था। एक सदी से भी पहले, हेनरी फोर्ड ने ‘मॉडल टी’ कार को इथेनॉल से चलाने के लिए डिजाइन किया था और ब्राजील तथा अमेरिका समेत दुनिया भर के देशों ने दशकों से इथेनॉल ब्लेंड का इस्तेमाल किया है।
- उतना ही जरूरी ये भी है कि भारत का इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम मौजूदा सरकार के समय शुरू नहीं हुआ था। इस पहल का एक लंबा संस्थागत इतिहास और कई अहम पड़ाव रहे हैं।
- 2001 में एक पायलट इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम शुरू किया गया, 2004 में इसकी औपचारिक घोषणा हुई और 2006 तक कई राज्यों में E5 (5% इथेनॉल ब्लेंडिंग) लागू कर दिया गया।
- इसके बाद, UPA सरकार के कार्यकाल में जनवरी 2013 में भारत के राजपत्र (Gazette of India) में इसकी पॉलिसी रूपरेखा अधिसूचित की गई। ये सभी बातें सार्वजनिक रिकॉर्ड में मौजूद हैं।
- भारत ने 10 राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों में 5% इथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य रखा था। दुर्भाग्य से, इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य के बावजूद, 2014 तक ब्लेंडिंग का स्तर लगभग 1.5% पर ही अटका रहा।
- फ्यूल के तौर पर इथेनॉल पर किसी ने सवाल नहीं उठाया। ये बात वैश्विक स्तर पर पहले ही तय हो चुकी थी। असली चुनौती ये थी कि भारत इथेनॉल का पर्याप्त उत्पादन कैसे करे।
- उस समय, हम लगभग पूरी तरह से गन्ने (एक मौसमी फसल) पर निर्भर थे और इथेनॉल उत्पादन की सालाना क्षमता लगभग 400 करोड़ लीटर थी। उत्पादन का ये स्तर मामूली ब्लेंडिंग लक्ष्यों के लिए भी अपर्याप्त था।
- इस कमी को समझते हुए, सरकार ने अपने नजरिए में बुनियादी बदलाव किया। मई 2018 में ‘नेशनल पॉलिसी ऑन बायोफ्यूल्स’ (जैव-ईंधन पर राष्ट्रीय नीति) शुरू होने के साथ, सरकार ने बड़े पैमाने पर इथेनॉल उत्पादन के लिए जरूरी इकोसिस्टम बनाना शुरू किया। ये सचमुच पूरी सरकार का एक साझा मिशन बन गया।
- पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय, खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, भारी उद्योग मंत्रालय, भारतीय रेलवे और कई अन्य मंत्रालयों ने फीडस्टॉक (कच्चे माल) का विस्तार करने, बुनियादी ढांचा बनाने, तकनीक को बढ़ावा देने, लॉजिस्टिक्स को व्यवस्थित करने, मांग की निश्चितता बनाने और निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए आपसी तालमेल के साथ काम किया।
अगस्त 2021 में एक अहम कदम उठाया गया, जब भारत की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (IOCL, BPCL और HPCL) ने इथेनॉल की कमी वाले क्षेत्रों में डेडिकेटेड इथेनॉल प्लांट (DEP) स्थापित करने के लिए ‘एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट’ (रुचि की अभिव्यक्ति) जारी किए।
इन प्रोजेक्ट्स ने इन्वेस्टमेंट के माहौल को बदल दिया, क्योंकि इनमें ये चीज़ें शामिल थीं-
- ऑयल मार्केटिंग कंपनियों द्वारा लंबे समय के लिए पक्का खरीद समझौता।
- एस्क्रो मैकेनिज्म के ज़रिए पब्लिक सेक्टर के बैंकों के साथ तीन-तरफ़ा फाइनेंसिंग व्यवस्था, जिससे इन्वेस्टमेंट का जोखिम काफ़ी कम हो गया।
- सिर्फ इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल प्रोग्राम के लिए इथेनॉल की अनिवार्य सप्लाई।
- इन प्लांट्स को चालू होने में स्वाभाविक रूप से लगभग दो साल लगे। क्षमता रातों-रात नहीं बन सकती थी।
- एक और अहम पड़ाव जून 2021 में आया जब नीति आयोग ने ऑटोमोबाइल बनाने वाली कंपनियों, तेल कंपनियों, कृषि विशेषज्ञों और दूसरे स्टेकहोल्डर्स के साथ व्यापक बातचीत के बाद इथेनॉल ब्लेंडिंग पर अपना विस्तृत रोडमैप जारी किया।
- रिपोर्ट में न सिर्फ इथेनॉल से पर्यावरण और ऊर्जा सुरक्षा को होने वाले फायदों पर जोर दिया गया, बल्कि ग्रामीण आय और कृषि अर्थव्यवस्था पर इसके क्रांतिकारी असर को भी उजागर किया गया।
- उस समय, भारत को 10% ब्लेंडिंग के लिए सालाना लगभग 500-600 करोड़ लीटर इथेनॉल की ज़रूरत थी। जैसे-जैसे नया इन्वेस्टमेंट हुआ और प्रोडक्शन क्षमता बढ़ी, ये साफ हो गया कि देश जल्द ही लगभग 1,200 करोड़ लीटर का प्रोडक्शन करने में सक्षम हो जाएगा। एक बार सप्लाई की व्यवस्था पक्की हो जाने के बाद, 20% ब्लेंडिंग का लक्ष्य रखना तार्किक और जिम्मेदार कदम था।
- इसलिए, ये सुझाव कि भारत ने इथेनॉल ब्लेंडिंग में “जल्दबाजी” की, तथ्यों से साबित नहीं होता।
- ये दो दशकों से ज्यादा का सफर रहा है- 2001 में पायलट प्रोजेक्ट्स से लेकर 2013 में पॉलिसी नोटिफिकेशन, 2018 के बाद संस्थागत सुधार, 2021 में बड़े पैमाने पर इन्वेस्टमेंट और फिर ब्लेंडिंग के स्तर में सावधानीपूर्वक और चरणबद्ध बढ़ोतरी।
- इसे लागू करने से पहले ऑटोमोबाइल कंपनियों, टेस्टिंग एजेंसियों, OMCs, DFPD वगैरह समेत सभी स्टेकहोल्डर्स से सलाह-मशविरा किया गया था।
- ब्राजील को कई दशक लगे, क्योंकि वो दुनिया का पहला बड़े पैमाने का इथेनॉल इकोसिस्टम बना रहा था।
- भारत को वैश्विक अनुभव से सीखने, साबित हो चुकी टेक्नोलॉजी को अपनाने, मंत्रालयों के बीच तालमेल बिठाने और एक मजबूत इन्वेस्टमेंट फ्रेमवर्क बनाने का फायदा मिला। हमने साइंस या सुरक्षा से समझौता किए बिना, बल्कि गवर्नेंस, प्लानिंग और काम करने के तरीके में सुधार करके इसे लागू करने के समय को कम किया।
- तो कुल मिलाकर, भारत की इथेनॉल सफलता के पीछे की असली कहानी सावधानीपूर्वक योजनाबद्ध, चरणबद्ध, धीरे-धीरे और क्रमवार बदलाव की है, ये कोई जल्दबाजी में या रातों-रात लिया गया फैसला नहीं है।
प्रश्न 2: ग्राहकों के पास शुद्ध पेट्रोल, E10 या E20 खरीदने का विकल्प क्यों नहीं है? उन पुरानी गाड़ियों का क्या, जो सिर्फ E10 के साथ चलने के लिए बनी हैं?
- जब भारत ने ज्यादा इथेनॉल वाले मिश्रण की ओर बढ़ने का फैसला किया, तो ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री हर चरण में शामिल थी। E10 के साथ चलने की क्षमता के लिए ऑटो कंपनियों से 2020-21 में ही काफी पहले सलाह-मशविरा किया गया था। भारत ने जून 2022 में अपना E10 लक्ष्य हासिल कर लिया, जो ESY 2020-21 की तय तारीख से 5 महीने पहले था।
- E20 के लिए और भी सख्त प्रक्रिया अपनाई गई। ऑटोमोबाइल कंपनियों, पार्ट्स सप्लाई करने वाली कंपनियों, टेस्टिंग एजेंसियों और रिसर्च इंस्टीट्यूट्स के साथ बड़े पैमाने पर बातचीत की गई। IMC का रोडमैप 2021 से ही सबके सामने था और इसमें E20 तक पहुंचने का एक व्यवस्थित तरीका बताया गया था।
- मटीरियल की अनुकूलता, इंजन कैलिब्रेशन, फ्यूल सिस्टम, गाड़ी चलाने में आसानी, ड्यूरेबिलिटी, उत्सर्जन और फ्यूल की बचत जैसे हर पहलू की जांच की गई।
- E20 को लॉन्च करने से पहले, सरकार ने पूरे इकोसिस्टम में तैयारी पक्की करने के लिए ऑटोमोबाइल कंपनियों, तकनीकी विशेषज्ञों, टेस्टिंग एजेंसियों और दूसरे स्टेकहोल्डर्स के साथ कई दौर की विस्तृत बातचीत की। अगर ऑटोमोबाइल कंपनियां नतीजों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं होतीं, तो वे कभी भी इस प्रोडक्ट का समर्थन नहीं करतीं या गाड़ियों की वॉरंटी नहीं देतीं। आज लगभग हर कंपनी सभी गाड़ियों (पुरानी या नई) के लिए वॉरंटी दे रही हैं, क्योंकि वे इस बातचीत का हिस्सा रही हैं।
- इसके अलावा, मारुति सुज़ुकी ने FY 2025-26 के दौरान 2.84 करोड़ गाड़ियों की सर्विस की, जिनमें 1.5 करोड़ पुरानी, बिना E20-सर्टिफाइड गाड़ियां शामिल थीं और E20 से जुड़ी कोई जंग, असामान्य घिसाव या पार्ट्स की उम्र कम होने जैसी कोई समस्या नहीं देखी गई। हीरो मोटोकॉर्प ने भी ऐसा ही अनुभव बताया है। असल दुनिया के ये सबूत अलग-थलग किस्सों की तुलना में कहीं ज्यादा भरोसेमंद हैं।
- ये सच है कि कुछ गाड़ियों में माइलेज में 3-5% की कमी आ सकती है। लेकिन माइलेज सिर्फ एक पैमाना है।
- E20 में काफी ज्यादा ऑक्टेन रेटिंग, बेहतर एंटी-नॉक गुण, तेजी से जलने की क्षमता, बेहतर पिकअप, स्मूद एक्सेलरेशन और साफ-सुथरा इंजन ऑपरेशन मिलता है।
- इससे बहुत कम पार्टिकुलेट उत्सर्जन होता है और लाइफसाइकल कार्बन उत्सर्जन में लगभग 40% की बड़ी कमी आती है। संक्षेप में, ये E10 या शुद्ध पेट्रोल की तुलना में ज्यादा साफ, बेहतर क्वालिटी वाला और ज्यादा कुशल फ्यूल है।
- तो असली सवाल ये है कि अगर साफ, तेज और कम प्रदूषण फैलाने वाला फ्यूल उपलब्ध है तो हम जान-बूझकर घटिया विकल्प क्यों चुनेंगे?
- ये सुझाव कि हर पेट्रोल पंप पर एक साथ शुद्ध पेट्रोल, E10 और E20 उपलब्ध होना चाहिए। ये भारत के फ्यूल डिस्ट्रिब्यूशन नेटवर्क की असलियत को नजरअंदाज करता है। भारत में एक लाख से ज्यादा रिटेल आउटलेट काम करते हैं, जिन्हें रिफाइनरियों, टर्मिनलों, डिपो और पाइपलाइनों के बड़े नेटवर्क का सहारा मिलता है। इस विशाल सप्लाई चेन में बेस पेट्रोल के कई ग्रेड बनाए रखने से लॉजिस्टिक्स की बड़ी चुनौती खड़ी होगी, हैंडलिंग की लागत बढ़ेगी, इन्वेंट्री मैनेजमेंट मुश्किल होगा और ऑपरेशनल क्षमता कम हो जाएगी।
- लोग अक्सर प्रीमियम पेट्रोल का उदाहरण देते हैं। ये तुलना सही नहीं है। प्रीमियम फ्यूल खास तरह के उत्पाद होते हैं, जो सीमित मात्रा में और ज्यादा कीमत पर बेचे जाते हैं क्योंकि उनमें परफॉर्मेंस बढ़ाने वाले खास एडिटिव्स मिलाए जाते हैं। वे देश भर में अलग-अलग बेस फ्यूल स्ट्रीम नहीं हैं। शुद्ध पेट्रोल, E10 और E20 के लिए देश भर में एक साथ सप्लाई चेन चलाना बिल्कुल अलग बात होगी।
- पिछले कुछ सालों में, सरकारी बैंकों ने इथेनॉल उत्पादन और उससे जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर में हर साल लगभग 1 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया है। भारत के ब्लेंडिंग लक्ष्यों को पूरा करने के लिए खास इथेनॉल प्लांट, डिस्टिलरी, स्टोरेज सुविधाएं और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क बनाए गए हैं।
- अगर इतनी क्षमता बनाने के बाद हम बिना सोचे-समझे वापस E10 पर आ जाएं, तो इन निवेशों का क्या होगा? अतिरिक्त उत्पादन क्षमता का क्या होगा? किसानों, सहकारी समितियों, उद्यमियों, वित्तीय संस्थानों और पब्लिक सेक्टर की कंपनियों द्वारा राष्ट्रीय नीति के आधार पर भरोसे के साथ निवेश किए गए हजारों करोड़ रुपयों का क्या होगा? ये एक और पहलू है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
- पब्लिक पॉलिसी में कंज्यूमर के हितों और ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण की स्थिरता, किसानों के कल्याण और राष्ट्रीय संसाधनों के समझदारी भरे इस्तेमाल के बीच संतुलन होना चाहिए।
- क्या आज कोई हमसे कहेगा कि हम आधुनिक पब्लिक ट्रांसपोर्ट के बजाय पुरानी नीली DTC बसें वापस ले आएं? क्या कोई तर्क देगा कि हमें गड्ढों वाली सड़कों पर वापस जाना चाहिए क्योंकि वे जानी-पहचानी थीं? क्या दिल्ली साफ ट्रांसपोर्ट फ्यूल की जगह ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले विकल्प अपनाएगी? तरक्की का मतलब है बेहतर टेक्नोलॉजी को अपनाना।
- E20 का मतलब है साफ दहन, कम उत्सर्जन, कच्चे तेल के आयात में कमी, भारतीय किसानों की ज्यादा आमदनी और देश के लिए ज्यादा ऊर्जा सुरक्षा। एक बार जब किसी बेहतर फ्यूल को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित, बड़े पैमाने पर परीक्षित और ऑटोमोटिव उद्योग द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है, तो लक्ष्य आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना होना चाहिए, न कि किसी घटिया मानक की ओर पीछे हटना।
प्रश्न 3: अगर E20 पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिलाया जाता है, तो ये E10 या शुद्ध पेट्रोल से सस्ता क्यों नहीं है?
- आज, सरकार इथेनॉल को अच्छी कीमतों पर खरीदती है ताकि भारतीय किसानों को सही दाम मिल सके। मक्के से बनने वाले इथेनॉल का ही उदाहरण लें। हमने धीरे-धीरे इसकी खरीद की कीमत बढ़ाई है और आज ये लगभग ₹71.86 प्रति लीटर है। इसमें GST, ट्रांसपोर्टेशन, स्टोरेज और डिपो हैंडलिंग का खर्च शामिल नहीं है।
- इसलिए, अगर इंटरनेशनल क्रूड ऑयल की कीमत लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल है, तो शुद्ध पेट्रोल की तुलना में E20 का उत्पादन असल में महंगा पड़ता है।
- अगर कच्चे तेल की कीमत 120-130 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ जाती है, तो स्थिति स्वाभाविक रूप से उलट जाती है और इथेनॉल और भी सस्ता हो जाता है।
- यहां सवाल ये नहीं होना चाहिए कि “E20 सस्ता क्यों नहीं है?” असली सवाल ये है कि “भारत ने कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव के पूरे असर से ग्राहकों को कैसे बचाया?” इसका जवाब आसान है।
- आज भारत में बिकने वाले हर लीटर पेट्रोल में लगभग 20% हिस्सा देश में बने इथेनॉल का होता है। उस इथेनॉल को लगभग ₹71 प्रति लीटर की कीमत पर खरीदा जाता है। ये ऐसी कीमत है जो हर सुबह ब्रेंट क्रूड, जियो-पॉलिटिकल झगड़ों या शिपिंग में रुकावटों के साथ बदलती नहीं है।
- दूसरे शब्दों में, आपके फ्यूल टैंक का 5वां हिस्सा इंटरनेशनल ऑयल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से सुरक्षित रहता है। यही एक मुख्य कारण है कि दुनिया भर में अभूतपूर्व उथल-पुथल के बावजूद भारत में रिटेल फ्यूल की कीमतों में सबसे कम बढ़ोतरी देखी गई।
- इसलिए, इथेनॉल ब्लेंडिंग का उद्देश्य किसी खास दिन पेट्रोल को सस्ता करना नहीं है। इसका उद्देश्य इम्पोर्टेड क्रूड ऑयल पर भारत की निर्भरता को कम करना है।
- नतीजतन, पिछले चार सालों में भारत ने बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और अपने पड़ोसी देशों की तुलना में फ्यूल की कीमतों में सबसे कम बढ़ोतरी दर्ज की।
|
पेट्रोल (रुपये प्रति लीटर) |
डीजल (प्रति लीटर) |
|||||
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देश |
जून-22 |
जून-26 |
(कीमत में बढ़ोतरी प्रतिशत में) |
जून-22 |
जून-26 |
(कीमत में बढ़ोतरी प्रतिशत में) |
|
पाकिस्तान |
92.64 रुपये |
129.48 रुपये |
39.77 |
79.98 रुपये |
130.51 रुपये |
63.18 |
|
श्रीलंका |
90.43 रुपये |
123.59 रुपये |
36.66 |
86.13 रुपये |
115.90 रुपये |
34.57 |
|
नेपाल |
113.99 रुपये |
137.19 रुपये |
20.35 |
103.22 रुपये |
142.25 रुपये |
37.81 |
|
बांग्लादेश |
76.97 रुपये |
109.82 रुपये |
42.69 |
71.60 रुपये |
90.21 रुपये |
26 |
|
इटली |
166.85 रुपये |
197.52 रुपये |
18.39 |
161.38 रुपये |
207.84 रुपये |
28.79 |
|
जर्मनी |
163.18 रुपये |
194.26 रुपये |
19.05 |
167.70 रुपये |
184.55 रुपये |
10.04 |
|
फ्रांस |
174.18 रुपये |
205.08 रुपये |
17.74 |
171.06 रुपये |
203.95 रुपये |
19.23 |
|
भारत (दिल्ली) |
96.72 रुपये |
102.12 रुपये |
5.58 |
89.62 रुपये |
95.20 रुपये |
6.23 |
इस टेबल से पता चलता है कि पश्चिम एशिया संकट शुरू होने के बाद से दूसरे देशों की तुलना में भारत में फ्यूल की कीमतों में सबसे कम बढ़ोतरी हुई है।
| पेट्रोल (रुपये प्रति लीटर) | डीजल (रुपये प्रति लीटर) | |||||
| देश | मार्च 2026 | जून 2026 | (कीमत में बढ़ोतरी प्रतिशत में) | मार्च 2026 | जून 2026 | (कीमत में बढ़ोतरी प्रतिशत में) |
| पाकिस्तान | 86.85 रुपये | 130.61 रुपये | 50.39 | 91.64 रुपये | 130.27 रुपये | 42.15 |
| श्रीलंका | 86.79 रुपये | 125.81 रुपये | 44.96 | 83.24 रुपये | 117.98 रुपये | 41.73 |
| नेपाल | 99.28 रुपये | 136.89 रुपये | 37.88 | 89.79 रुपये | 141.93 रुपये | 58.07 |
| बांग्लादेश | 87.08 रुपये | 109.62 रुपये | 25.88 | 75.07 रुपये | 90.04 रुपये | 19.94 |
| भारत (दिल्ली) | 94.77 रुपये | 102.12 रुपये | 7.76 | 87.67 रुपये | 95.2 रुपये | 8.59 |
प्रत्येक लीटर इथेनॉल ब्लेंडिंग का मतलब है-
- कम आयातित कच्चा तेल
- विदेशी मुद्रा का कम खर्च
- भारतीय किसानों की ज्यादा आमदनी
- ग्राहकों के लिए कीमतों में ज्यादा स्थिरता
- मजबूत राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा।
इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल प्रोग्राम (ESY 14-15 से) ने अब तक क्या-क्या हासिल किया
- विदेशी मुद्रा में ₹1.97 लाख करोड़ से ज्यादा की बचत की है।
- लगभग 316 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल की जगह ली है।
- करीब 952 लाख मीट्रिक टन CO₂ उत्सर्जन कम किया है।
- ₹1.66 लाख करोड़ से ज्यादा की रकम सीधे भारतीय किसानों तक पहुंचाई है।
- हमारे किसान अब सिर्फ ‘अन्नदाता’ नहीं रहे, वो ‘ऊर्जादाता’ बन गए हैं और भारत की ऊर्जा सुरक्षा में सीधे योगदान दे रहे हैं।
प्रश्न 4: ऐसी चिंताएं हैं कि E20 रबर के पार्ट्स को नुकसान पहुंचाता है, पुरानी गाड़ियों के इंजन पर बुरा असर डालता है और कई गाड़ियों के मैनुअल में खास तौर पर “E10 कम्पैटिबल” लिखा होता है। क्या पुरानी गाड़ियों के मालिकों को चिंता करनी चाहिए?
दुर्भाग्य से, जैसे-जैसे भारत का इथेनॉल प्रोग्राम बढ़ा है, वैसे-वैसे इससे जुड़ी गलत जानकारी भी फैली है। जब से भारत ने E85 पेश किया है, तब से कुछ खास हितों वाले ग्रुप्स ने बेवजह डर पैदा करने की कोशिश की है। हर कुछ महीनों में एक नई अफवाह सामने आती है, जैसे- रबर की होज खराब हो जाएंगी, इंजन सीज हो जाएंगे, फ्यूल टैंक में जंग लग जाएगा। इनमें से कोई भी दावा वैज्ञानिक सबूतों पर खरा नहीं उतरता।
- भारत का E20 की ओर बढ़ना रातों-रात लिया गया फैसला नहीं था।
- रोडमैप को अंतिम रूप देने से पहले, सरकार ने ऑटोमोबाइल बनाने वाली कंपनियों, ARAI, SIAM, तेल कंपनियों और तकनीकी संस्थानों को शामिल करके एक्सपर्ट कमेटियां बनाई थीं।
- 2021 में, नीति आयोग ने सभी स्टेकहोल्डर्स के साथ व्यापक बातचीत के बाद एक विस्तृत रोडमैप जारी किया। उसी रोडमैप में E10 से E20 में बदलाव और ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री की तैयारियों पर भी बात की गई थी। इसलिए, गाड़ी बनाने वाली कंपनियों को पॉलिसी की दिशा के बारे में कई साल पहले से ही पता था।
- अगर बनाने वाली कंपनियां इसमें शामिल नहीं होतीं, तो वे कभी भी E20 कम्पैटिबल गाड़ियों को सर्टिफाई नहीं करतीं या वॉरंटी की शर्तों को नहीं मानतीं।
- E15+ ब्लेंड्स अब पूरे भारत में 3.5 साल से ज्यादा समय से इस्तेमाल हो रहे हैं।
- E20 को लागू करने से पहले, इसकी व्यापक वैज्ञानिक टेस्टिंग हुई और उसके बाद इंजन की ड्यूरेबिलिटी, फ्यूल सिस्टम, मटीरियल कम्पैटिबिलिटी, जंग से बचाव, गाड़ी चलाने में आसानी, एमिशन और परफॉर्मेंस को लेकर बड़े पैमाने पर फील्ड वैलिडेशन किया गया।
- लेकिन लैब टेस्टिंग कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है। सबसे बड़ा सबूत असल दुनिया से मिलता है।
- अकेले मारुति सुजुकी ने लगभग 2.5 करोड़ गाड़ियों की सर्विस की, जिनमें करीब 1.5 करोड़ पुरानी गाड़ियां शामिल थीं, जिन्हें शुरू में E20 कम्पैटिबल के तौर पर सर्टिफाई नहीं किया गया था।
- अगर E20 सच में रबर के पार्ट्स, फ्यूल लाइन या इंजन को नुकसान पहुंचाता, तो हमें देश भर में लाखों वॉरंटी क्लेम, बड़े पैमाने पर पार्ट्स खराब होने और शिकायतों की बाढ़ देखने को मिलती। ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ।
- एक और चिंता गाड़ी के मैनुअल में “E10 कम्पैटिबल” लिखे होने से जुड़ी है। लोगों को ये समझना चाहिए कि उन लेबल का क्या मतलब है। गाड़ी का मैनुअल उस समय के फ्यूल स्पेसिफिकेशन को दिखाता है, जब गाड़ी को होमोलोगेट और सर्टिफाई किया गया था। इसका मतलब ये नहीं है कि अगर बाद में बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक टेस्टिंग, इंजीनियरिंग वैलिडेशन और रेगुलेटरी मंजूरी के बाद फ्यूल स्टैंडर्ड्स में बदलाव होता है, तो गाड़ी अचानक असुरक्षित हो जाएगी। अगर इस तर्क को हर जगह लागू किया जाए, तो कोई भी देश कभी भी अपने फ्यूल स्टैंडर्ड्स को अपग्रेड नहीं कर पाएगा। इसलिए, E10 से E20 में बदलाव किसी अंदाजे पर नहीं, बल्कि कई सालों की टेस्टिंग, ऑटो कंपनियों के साथ बातचीत और फील्ड के अनुभव पर आधारित था।
- भारत की इथेनॉल सप्लाई चेन देश के सबसे कड़ाई से रेगुलेटेड फ्यूल सप्लाई सिस्टम में से एक है। इथेनॉल और ब्लेंडेड पेट्रोल कड़े BIS स्पेसिफिकेशन्स के मुताबिक होते हैं और डिस्टिलरी से लेकर डिपो और रिटेल आउटलेट तक हर स्टेज पर इनकी क्वालिटी की जांच होती है।
- सप्लाई चेन में कहीं भी किसी भी तरह की प्रक्रियात्मक चूक से सख्ती से निपटा जाएगा। राज्यों के मुख्य सचिवों से कहा गया है कि वे नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करें और मिलावट के किसी भी मामले में कड़ी कार्रवाई करें। फ्यूल की क्वालिटी से समझौता करने वाली चूक के लिए जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई जाएगी।
- E20 एक सुरक्षित, साफ, परखा हुआ और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित फ्यूल है, जिसका इस्तेमाल भारतीय ग्राहक भरोसे के साथ कर सकते हैं। इसकी क्वालिटी, सुरक्षा और कम्पैटिबिलिटी को सभी ज़िम्मेदार स्टेकहोल्डर्स ने प्रमाणित और सुनिश्चित किया है, जिनमें ऑटोमोबाइल कंपनियों, टेस्टिंग और होमोलोगेशन एजेंसियां, ऑयल मार्केटिंग कंपनियां और रेगुलेटरी अथॉरिटीज शामिल हैं।
इसलिए ग्राहकों को सलाह दी जाती है कि वे सोशल मीडिया पर फैल रही गलत जानकारी, डराने-धमकाने वाली बातों या बिना पुष्टि वाली सामग्री से गुमराह न हों।


